कालसर्प दोष

कालसर्प योग क्या है ?
इसका निवारण कैसे हो ?


जन्म कुंडली में सबसे ख़राब फल देने वाले योगों में काल सर्प योग का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है. जब यह योग जाग्रत होता है तो इसके नकारात्मक प्रभाव जीवन को तहस नहस कर डालते हैं. यह योग कुंडली में जिस भाव से सम्बंधित होता है उस भाव को तो बर्बाद ही कर डालता है. कालसर्प योग कैसे बनता है ? इसका क्या प्रभाव रहता है ? इसका नकारात्मक प्रभाव कब जाग्रत होता है ? इसके अशुभ प्रभाव को रोकने के लिए क्या उपाय और सावधानियां करने चाहिए, इस तरह के अनेकानेक प्रश्न ऐसे लोगों के मन में घुमड़ते रहते हैं जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष होना बताया गया होता है. कालसर्प दोष उस स्थिति में बनता है जबकि कुंडली में सूर्य आदि सप्तग्रह राहु-केतु के एक तरफ बैठ जाते हैं.
हमारे अनुभव में आया है कि जब कुंडली में सभी ग्रह युति या द्दष्टि द्वारा राहु-केतु से पीड़ित होते हैं तो भी कालसर्प योग जैसे दुष्परिणाम जातक के जीवन में देखने को मिलते हैं. आगे दी जा रही कुंडली देखकर इसे समझा जा सकता है. यदि कुंडली में एक ग्रह राहु केतु की परिधि से बाहर हो या द्रष्टि से बाहर हो तो आंशिक कालसर्प योग बनता है. ये जहर भी जातक के जीवन में जहर घोलता है. कालसर्प योग चाहे पूर्ण हो या आंशिक इसकी विधिवत शांति अवश्य करनी चाहिए. कभी कभी ऐसा भी देखने में आता है कि कालसर्प योग होने के बावजूद जीवन में इसका कोई नकारात्मक प्रभाव दिखाई नहीं देता. ऐसी स्थिति में लोग कालसर्प योग की शांति करने के इच्छुक नहीं होते. कई बार कालसर्प की शांति के लिए जातक किसी पंडित की सलाह पर शिवलिंग पर नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाकर कालसर्प की शांति मान बैठते हैं. जबकि कालसर्प योग की विधिपूर्वक शांति और जीवित सर्प के पूजन के उपरांत उसे जंगल में छोड़ने के बाद ही इस दुर्योग की शांति होती है. कालसर्प के पूजन में 4-5 घंटे का समय लग ही जाता है. कालसर्प योग की शांति के लिए ग्रह शक्ति द्वारा दो विशाल सामूहिक कालसर्प दोष निवारण महायज्ञों का आयोजन किया गया. जिसमें 100 से अधिक लोगों की कालसर्प दोष शांति कराई गई. कालसर्प दोष के अनुष्ठान में पीड़ित जातक हवन के बाद जिन कपड़ों को पहनकर पूजा करते हैं उन्हें पहनकर यमुना में स्नान करना होता है. तथा स्नान के बाद कपड़े वहीं पर छोड़कर दूसरे कपड़े पहनकर घर लौटते हैं.
कालसर्प योग के प्रमुख अशुभ प्रभावों का विवरण आगे दिया जा रहा है -
1. अचानक भारी धन हानि होना / धन के लिए तरसना / कठोर परिश्रम का फल नहीं मिलना.
2. दाम्पत्य सुख में भारी रुकावटें आना / कुलक्षणी पति या पत्नी का मिलना / विवाह में धोखा होना.
3. संतान का अवरोध के रूप में प्रकट होना / संतान प्राप्ति में बार-बार विघ्न होना.
4. भावनात्मक पीड़ा बने रहना / निराशा और हीनता की भावना का हावी होना.
5. स्वयं या प्रियजन की दुर्घटना में काल मृत्यु का भय होना.
कालसर्प योग कब जाग्रत होता है ?
कालसर्प योग राहु-केतु के कारण बनता है इसलिए जब कालसर्प से पीड़ित जातक राहु या केतु की दशा या अन्तर्दशा में चलते हैं तो कालसर्प का अशुभ प्रभाव जाग्रत हो जाता है. वह ग्रह जो राहु के नक्षत्र में बैठा हो उसकी दशा में भी कालसर्प का नकारात्मक प्रभाव मिलना शुरू हो जाता है. राहु-केतु के साथ बैठे ग्रह की दशा / अन्तर्दशा में भी कालसर्प योग जाग्रत हो जाता है. यदि कुंडली में चंद्रमा पाप ग्रहों के प्रभाव से पीड़ित और कमजोर हो तो कालसर्प का अशुभ प्रभाव बढ़ जाता है.
जिस दिन आपको कालसर्प दोष निवारण पूजा में शामिल होना है उस दिन आपको व्रत करना चाहिए. सुबह के समय फलाहार कर सकते हैं. अनुष्ठान में पूजन के समय अपना नाम, गोत्र आदि याद रखें. अनुष्ठान के बाद पूजन के समय धारण किये गए वस्त्र यमुना किनारे छोड़ने होंगे. जो व्यक्ति कालसर्प दोष निवारण अनुष्ठान में शामिल होना चाहते हैं. उन्हें यथाशीघ्र ग्रह शक्ति कार्यालय में संपर्क करके अपना स्थान सुनिश्चित करा लेना चाहिए.

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