ज्योतिष और विवाह

ज्योतिष और  विवाह

विवाह का प्रथम उद्देश्य स्रष्टि विस्तार के लिए स्त्रीत्व और पुरुषत्व धारा का सम्मिलन है. प्रकृति के प्रत्येक अणु में दोनों शक्तियां विद्यमान रहती हैं और स्रष्टि विस्तार के लिए इन दोनों का सम्मिलन प्राकृतिक प्रेरणा से होता है. यह सम्मिलन ही स्रष्टि का कारण है और प्रवाह रूप से संसार को अनंतकाल तक जीवित रखता आया है.
चौरासी लाख पशु-पक्षी, पतंगादि योनियां भोगकर ही मानव शरीर प्राप्त होता है. इस योनि में यद्यपि परमात्मा ने मनुष्य को दया करके सदविवेकी बुद्वि प्रदान की है किन्तु अनेक योनियों में पड़ा हुआ पशु संस्कार उससे छूटता नहीं है, जिससे मनुष्य की प्रवृत्ति स्वच्छंद आहार-विहार की ओर स्वभावत: झुकी रहती है. प्रत्येक पुरुष के ह्रदय में संसार भर की स्त्रियों के लिए और स्त्रियों में सभी पुरुषों के लिए भोग भावना प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहती है. जब कभी उसे अवसर मिलता है वह अपनी इस पशु प्रवृत्ति को चरितार्थ करने में नहीं चूकता. नर-नारियों की इस पशु समान स्वच्छंद तथा निर्बाध काम भावना को एक स्त्री व एक पुरुष में बांध देना और अनेक प्रकार के शास्त्रीय नियमों द्वारा धीरे-धीरे इसे निवृत्ति की ओर ले जाना ही इसका दूसरा उद्देश्य है.
विवाह का तीसरा उद्देश्य है प्रजोत्पत्ति द्वारा पित्रऋण से मुक्ति तथा वंश रक्षा. विवाह का उद्देश्य भोग विलास नहीं है किन्तु ‘प्रजायै गृहमेधिनाम’ के अनुसार संतानोत्पत्ति ही उसका प्रयोजन है. शास्त्र द्रष्टा मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं 1. देवऋण 2. ऋषिऋण 3. पितृऋण. इनमें से यज्ञयाग देवपूजनादि द्वारा देवऋण से, शास्त्रों एवं वेदों के स्वाध्याय से ऋषिऋण से मनुष्य मुक्त हो जाता है शेष पितृऋण से मुक्ति प्रजोत्पादन द्वारा ही होती है. इसके अतिरिक्त चूंकि आत्मा सच्चिदानंद प्रभु का ही अंश है इसलिए सत् चित्त आनंदरूपी तीनों गुणों की ओर उसकी प्रवृत्ति स्वभावत: ही होती है. इनमें से सत् का ही प्रकृत विषय से सम्बन्ध है. सत् का अर्थ है सत्ता. मनुष्य अपनी सत्ता को सर्वदा बनाए रखना चाहता है, उसकी इस अभिलाषा का फल ही संतान है जिसे उत्पन्न करके वह संतोष का अनुभव करता है. पुत्र उसका अपना ही रूप है और उसकी उपस्थिति से वह अपनी सत् भावना को सफल समझता है. यही प्रवृत्ति विवाहमूलक वंश परम्परा को जन्म देती है, जिसकी रक्षा के लिए अनेक प्रकार के यज्ञानुष्ठानादि का आश्रय लेकर भी मनुष्य सत् प्रयत्नशील रहता है.
मनुष्य स्वार्थी प्राणी है. उसे शरीर से जितनी मोह ममता होती है उतनी और किसी वस्तु से नहीं. विवाह द्वारा मनुष्य के इस ममत्व क्षेत्र को विस्तार मिलता है. अब तक उसका जो प्रेम और मोह अपने शरीर मात्र में था, वह क्रमश: पत्नी, पुत्र, कन्या, सगे सम्बन्धी आदि परिवार में विभक्त हो जाता है. इस प्रकार यह स्वार्थपरक प्रेम पहले घर की चारदीवारी से प्रारम्भ होकर मुहल्ला, गली, नगर, प्रान्त, देश और समस्त विश्व में व्याप्त होकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के पुनीत आदर्श का व्यावहारिक रूप धारण कर लेता है. विश्व प्रेम ममत्व की अंतिम श्रेणी है और इस पर पहुंचकर मनुष्य ‘यो माम पश्यति सर्वत्र मयि पश्यति’ के उच्च शिखर पर पहुंच जाता है. इसलिए स्वार्थपरक प्रेम को विस्तृत कर उसकी मुक्ति में पर्यवसान ही विवाह का चौथा उद्देश्य है.
त्याग, क्षमा, धैर्य, संतोषादि गुणों का संग्रह तथा अभ्यास विवाह का पांचवा उद्देश्य है. गृहस्थ धर्म में रहते हुए दंपत्ति को एक दूसरे के हित के लिए स्वार्थ, त्याग, स्वप्रतिकूल व्यवहार में क्षमा, अत्यंत कष्ट में भी धैर्य आदि गुणों का प्रयोग करना अनिवार्य हो जाता है. यही गुण विकसित होकर मनुष्य को सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं. गृहस्थ धर्म की इस पाठशाला में त्याग, प्रेम आदि का पूर्ण अभ्यास कर जब दंपत्ति इनका प्रयोग ईश्वर प्राप्ति के आध्यात्मिक मार्ग में करते हैं तो वे भगवत प्राप्ति के अत्यंत निकट पहुंच जाते हैं. यही उनके जीवन का उद्देश्य है.

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