ज्योतिष और संतान सुख

योग्य एवं गुणी संतान कैसे प्राप्त हो ?
प्रकाश चन्द्र सोनी ‘यौवन’


वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में प्रत्येक व्यक्ति अपनी संतान से अपेक्षा रखता है कि वह प्रशासनिक अधिकारी, डाक्टर, इंजीनियर अथवा बहुत बड़ा व्यवसायी बने. उसके पास बहुत सारा धन हो, उसका खूब नाम हो तथा वह सुखमय जीवन जिये. संतान को योग्य बनाकर व्यक्ति अपना बुढ़ापा आनंदमय बिताना चाहता है, किन्तु आज अधिकांशत: इसका उल्टा हो रहा है बुढ़ापे में व्यक्ति को सुख व आनंद के बजाय उपेक्षा ओर कुंठायें मिल रही हैं. ऐसा क्यों ? सीधा सा उत्तर है – बोवै पेड़ बबूल का आम कहां से होय. किसान बीज बोने से पहले खेत को तैयार करता है ओर उचित समय में बीज बोता है, किंतु नारी रूपी खेती के गर्भ में बीज डालने से पूर्व व्यक्ति तनिक भी विचार नहीं करता. न गर्भाधान के पूर्व तैयारी और न उचित समय का ज्ञान, फिर कैसे प्राप्त हो योग्य एवं गुणी संतान.
हमारे धर्मशास्त्रों में जीवन को आनंदमय बनाने के लिए सोलह संस्कारों का विवेचन किया है, जिनमे प्रथम संस्कार है – गर्भाधान संस्कार. जिसे हम आज भूल चुके हैं. आइये इस पर विचार करें. आगाज अच्छा तो अंजाम अच्छा. उचित विधि एवं उचित समय में बोया बीज अच्छा फल देता है, बस यही है – गर्भाधान संस्कार.
गर्भाधान संस्कार की अनेकानेक विधियां शास्त्रोक्त है, जिनका पालन करने से व्यक्ति योग्य एवं गुणी संतान प्राप्त कर सकता है. स्त्री को प्रतिमाह रक्तस्त्राव होता है, जिसे मासिक धर्म कहते हैं. मासिक धर्म प्रारंभ होने के दिन को प्रथम दिन एवं उस दिन की रात्रि को प्रथम रात्रि मानकर गणना करनी चाहिए. गर्भधारण के लिए पहली से चौथी रात्रि वर्जित है. इन चार रात्रियो में गर्भाधान तो दूर सहवास करने मात्र से पुरुष रोगग्रस्त हो सकता है. पांचवी रात्रि को गर्भाधान करने से साधारण व रोगी कन्या, छठी रात्रि से मध्यम रोगी पुत्र, सातवीं रात्रि से बांझ मुरझाई कन्या, आठवीं रात्रि से उत्तम पुत्र, नवीं रात्रि से सुन्दर सुशील कन्या, दसवीं रात्रि से बुद्विमान पुत्र, ग्यारहवीं रात्रि से बेडौल कन्या, बारहवीं रात्रि से श्रेष्ठ गुणवान पुत्र, तेरहवीं रात्रि से दुराचारिणी कन्या, चौदहवीं रात्रि से धर्मात्मा-पुण्यात्मा पुत्र, पंद्रहवीं रात्रि से पतिव्रता-सुलक्षणा पुत्री की प्राप्ति होती है. सोलहवीं रात्रि का पुत्र राजा के समान होता है.
नक्षत्रों के अनुसार उत्तम, स्वस्थ, दीर्घायु, एवं संस्कारी संतान हेतु हस्त, रोहिणी, अनुराधा, श्रवन, स्वाति, धनिष्ठा, शतभिषा, मृगशिरा, एवं तीनों उत्तरा. मध्यम तथा साधारण संतान के लिए चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य एवं अश्विनी नक्षत्र वाली रात्रि में गर्भाधान संस्कार करना चाहिए. इनके अतिरिक्त सभी नक्षत्र गर्भाधान संस्कार के लिए निषेध हैं.
इस संस्कार में स्वर का भी अत्यधिक महत्व है. गर्भाधान के समय पुत्र प्राप्ति के लिए पुरुष का दायां और स्त्री का बायां स्वर तथा पुत्री प्राप्ति के लिए पुरुष का बायां और स्त्री का दायां स्वर चलना चाहिए. स्खलन पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए. यदि पुरुष पहले स्खलित होता है तो पुत्री, स्त्री पहले स्खलित होती है तो पुत्र, किंतु यदि दोनों एक साथ स्खलित होते हैं तो नपुसंक के समान संतान प्राप्त होती है.
इस प्रकार गर्भाधान संस्कार में सम-विषम रात्रि, नक्षत्र, स्वर एवं स्खलन के महत्व को समझकर संस्कार करने से योग्य एवं गुणी संतान प्राप्त की जा सकती है. आजकल के प्रदूषित वातावरण में पौरुष निर्बलता एवं स्त्री के मासिक धर्म की अनियमितता प्राय: देखी जाती है. अत: योग्य चिकित्सक से इसकी चिकित्सा करा लेनी चाहिए. केवल पंचांग में नक्षत्र देखकर ही यह संस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि नक्षत्रों का समय घटता-बढ़ता रहता है. किसी योग्य पंडित से इस विषय में परामर्श लेकर ही यह संस्कार सम्पादित करना चाहिए. अपने अल्पज्ञान से मैंने सुधि पाठकों के समक्ष गर्भाधान संस्कार का महत्व उजागर करने का तुच्छ प्रयास किया है. आशा है पाठक इसे पसंद कर जीवन को आनंदमय बनाने का प्रयास करेंगे.

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