ज्योतिष और स्वास्थ्य

ज्योतिष एवं स्वास्थ्य 

डा. सीमा मोरवाल

ईश्वर ने पृथ्वी का निर्माण किया तभी से मनुष्य को बुद्वि, विवेक, ज्ञान एवं विज्ञान दिया ताकि मानव स्वयं अपनी रक्षा कर सके. मानव ने अपने जीवन को स्वस्थ व सुचारू रूप से चलाने के लिए ज्ञान व विज्ञान की सहायता से नवीन खोजें की तथा ये जाना कि उनके लिए क्या सही है क्या गलत. इस पृथ्वी पर शायद ही कोई ऐसा मानव होगा जिसे कोई रोग न हो. हिन्दू धर्मग्रंथों में स्वास्थ्य व रोग तथा उनसे बचने के उपायों का वर्णन मिलता है. साथ ही साथ ज्योतिषीय आधार पर कई ग्रंथों में छुपे हुए रोगों के विषय में जानकारी प्राप्त करने के सिद्वान्तों का वर्णन मिलता है. वर्तमान समय में विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्वतियों का अविष्कार हो चुका है. जैसे : एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथिक, एक्यूप्रेशर योग इत्यादि, इन सब का मुख्य उद्देश्य मानवता की रक्षा करना है वही हमारा ज्योतिष शास्त्र भी इस उद्देश्य से पीछे नहीं है. हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियों ने जो खोजें की वे आज भी सार्थक है. स्वस्थ मनुष्य के शरीर में उसका प्रत्येक अंग सही व सुचारू रूप से कार्य करता है यदि वही सब सुचारू न चले तो रोग कहलाता है.
ज्योतिषीय आधार पर मनुष्य के शरीर को बारह भागों में बांटा गया है उन भागों में बारह ही राशियों का अधिकार होता है. प्रत्येक अंग का प्रतिनिधित्व एक राशि करती है वे इस प्रकार हैं -
अंग                                          राशि
सिर, चेहरा, मुख की हड्डियां – मेष
गला व इसकी हड्डियां – वृष
बाजू, कंधा, हंसली की हड्डी, विभिन्न जोड़ – मिथुन
छाती, इसकी हड्डी, पसलियां – कर्क
मेरुदंड, पेट – सिंह
पेट, कमर, रीढ़ – कन्या
त्वचा – तुला
मूत्राशय, गुदा, गुप्तांग – वृश्चिक
जांघ, कूल्हा – धनु
घुटना, परिया, घुटने के जोड़ – मकर
टांगे, एड़ी, एड़ी की हड्डी – कुम्भ
पैर, पैर की अंगुली – मीन
ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर का प्रत्येक अंग भी विभिन्न ग्रहों के प्रभाव में हैं आइये इन्हें इस प्रकार समझते हैं -
सूर्य :- जो आत्मा का कारक है और सभी मनुष्य को जीवन देता है विध्वंसकारी होने के साथ गरम, सूखा व निर्माता ग्रह है. ह्रदय, जीवन, दिमाग, खून, पुरुष की दाईं एवं स्त्री की जातक की बाई आंख का प्रतिनिधित्व करता है.
चन्द्र :- पुरुष की बाई आंख, स्त्री की दाईं आंख, स्त्री की छाती, पेट, शरीर में रक्त संचार.
बुध :- विचारों का परिवर्तन, श्वशनतंत्र, जुबान, फेफड़े, दिमाग, शरीर के बाल, वाणी, हाथ, बांहें.
बृहस्पति :- लीवर, शिरा, दायां कान, चर्बी, खून.
शुक्र :- चेहरा, शरीर का रंग, गला, गुप्तांग व उसके भाग.
मंगल :- नाक, माथा, मांसपेशी, लिंग, योनि, पित्त की थैली.
शनि :- हड्डियां, जोड़, दांत, घुटने व ग्रंथियां.
महिला व पुरुष के स्वास्थ्य के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए पाराशर ऋषि द्वारा प्रतिपादित सुदर्शन सिद्वांत के अनुसार लग्न से अध्ययन किया जाता है. इसके अनुसार जातक के शरीर की बनावट, स्वभाव, बुद्वि, शारीरिक ताकत का पता आसानी से लग जाता है. प्रत्येक मनुष्य की जन्म पत्रिका बारह भावों में बंटी होती है. इन्हीं भावों के आधार पर हम पत्रिका पर शोध करते हैं. मनुष्य के स्वास्थ्य के विषय में जानकारी हेतु कुंडली का चौथा, छठा, आठवां भाव मुख्य होता है लेकिन छठा भाव बहुत ही महत्वपूर्ण भाव होता है जो बीमारियों के विषय में बताता है यदि उपर्युक्त राशियां छठे भाव में आये तो उनसे सम्बंधित रोग होगा.
ज्योतिष में सूर्य ग्रह को पितृ तथा चंद्रमा को मातृ स्थान दिया गया है. मां-पिता अपने बच्चों को कभी कष्ट नहीं देते फिर भी ऐसा देखा गया है कि ये दोनों भी अन्य ग्रहों की तरह मनुष्य को पूर्वजन्म के अनुसार कष्ट व रोग देते हैं. विभिन्न ग्रहों द्वारा जनित रोगों का वर्णन भी इसी क्रम में करते हुए हम देखते हैं कि ग्रहों द्वारा किस प्रकार के रोग मनुष्य को दिए जाते हैं :-
बृहस्पति - यह ग्रह अत्यंत शुभ ग्रह माना जाता है लेकिन फिर भी यह मनुष्य को बीमारियां देता है जब बृहस्पति पाप ग्रहों से घिरा हो तो रक्त सम्बन्धी विकार देता है कि मनुष्य के शरीर का रक्त तक बदलना पड़ सकता है. यकृत से सम्बंधित बीमारी, मोटापा भी इस ग्रह के कारण होता है. यदि ग्रह पर पाप ग्रहों का असर न हो और यह छठवें भाव में हो तो मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक रहता है और यदि पाप ग्रहों से आक्रांत है तो पाचन क्रिया में गड़बड़ी, स्कर्बी, गुर्दे की बीमारी, मधुमेह, अनीमिया, पीलिया खानपान सम्बन्धी रोग हो सकते हैं.
बुध :- यह ग्रह बुद्वि का अधिकारी होता है. इसलिए यह दिमाग को प्रभावित करता है. मस्तिष्क से सम्बंधित रोग जैसे – नर्वस सिस्टम, सिरदर्द, याददाश्त में कमी, कंधे, हाथ व बाजुओं में दर्द इत्यादि बीमारियां देता है.
मंगल :- मंगल ग्रह अग्नि का प्रतिनिधित्व करता है. अत: छठें भाव में किसी भी राशि में स्थित हो तो पथरी, निमोनिया, गैस, साइटिका, जलना, चोट लगना, टांसिल, दिमागी बुखार आदि रोग देता है.
शुक्र :- शुक्र भी स्त्रीकारक एक शुभ ग्रह है. यह सेक्स से सम्बंधित रोगों को जन्म देता है इसके अतिरिक्त गले के रोग, ह्रदय में जलन, टांसिल बढ़ना, मूत्र नलिका में सूजन, गुर्दा, गले के रोग, शिराओं से सम्बंधित परेशानी इसी ग्रह के कारण होती हैं. यदि यह ग्रह पाप ग्रहों से त्रस्त हो तो गले से सम्बंधित बीमारी देता है. खुजली, एग्जिमा, पस पड़ना, सांस में तकलीफ, बवासीर, टांगों और कूल्हों में दर्द की बीमारी होती है.
शनि :- यह अति पाप ग्रह है जो मानव को सबसे ज्यादा पीड़ा देता है. विभिन्न नए रोग उत्पन्न करना, उपचार व दवाई का बेअसर होना भी इसी ग्रह के कारण होता है. इस ग्रह को ज्योतिष के स्वास्थ्य खेमे में ” बिना कारण के मारने वाला हत्यारा” नाम से संबोधित किया जाता है, राहु के साथ मिलकर तो ये और भी खतरनाक होता है. राहु व शनि, सूर्य के विशेष शत्रु हैं तथा सूर्य आत्मकारक ग्रह है. शनि के कारण ठंड के रोग, गैगरीन, कैंसर, रीढ़ से सम्बंधित बीमारी, एड्स, अचानक दुर्घटना, बहरापन आदि बीमारियां जातक को हो जाती हैं.
चंद्रमा :- चंद्रमा मस्तिष्क, मां व दिमाग का कारक ग्रह है. मंगल से पीड़ित हो तो सिर का आपरेशन, आंखों का आपरेशन, दांत से सम्बंधित, गले में खून आना, पेट का आपरेशन इत्यादि बीमारियों का जन्मदाता बन जाता है परन्तु चंद्रमा स्वयं ये कार्य नहीं करता बल्कि पाप ग्रहों से ऐसे कार्य करवाता है.
सूर्य :- सूर्य जातक को ह्रदय से सम्बंधित बीमारियां देता है. हार्ट फेल, दिल का आपरेशन इत्यादि बीमारियां भी सूर्य के कारण ही उत्पन्न होती हैं क्योंकि सूर्य आत्मकारक ग्रह है. जब शनि व सूर्य दस अंश तक आमने-सामने हों तो स्थाई रोग देते हैं.
राहु-केतु :- यह भी पाप ग्रह हैं तो मनुष्य को खतरा व बीमारियों की सौगात देते हैं. जब राहु की महादशा या प्रत्यंतर दशा होती है और वे जिस ग्रह की राशि में बैठे होते हैं उसी ग्रह से सम्बंधित बीमारी देते हैं तथा भ्रम भी उत्पन्न करते हैं. असली बीमारी का पता नहीं लगने देते तथा ये ग्रह अचानक बीमारियां भी देते हैं. उपचार में भी कठिनाई उत्पन्न करते हैं.
इस प्रकार आपने अध्ययन किया कि किस प्रकार सभी ग्रह जहां अच्छा कार्य करते है वहीं कोई न कोई बीमारी अवश्य देते हैं. इस तरह हम यह भी देखते हैं कि ज्योतिष सम्पूर्ण वैज्ञानिक द्रष्टिकोण पर आधारित है इस संसार में तथा मानव शरीर में घटने वाली घटनाओं का कारक ग्रह होते हैं. वैज्ञानिक द्रष्टिकोण रखते हुए हम यह भी कह सकते हैं कि ग्रहों से आने वाली कौस्मिक रेज पृथ्वी व उस पर रहने वालों पर बुरा या अच्छा प्रभाव डालती है. पूर्व प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी जी का घुटनों से सम्बंधित रोग राहु ग्रह जनित था जो घुटने या पीठ के रोगों की कारक राशि है.
इस प्रकार विभिन्न ग्रह मनुष्य के स्वास्थ्य व जीवन को पूर्ण रूपेण प्रभावित करते हैं. यह सब ज्योतिष के वैज्ञानिक द्रष्टिकोण के फलस्वरूप सामने आया है.

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