पंचांग

क्या है पंचांग

ज्योतिष सीखने के लिए पंचांग की जानकारी और पंचांग को देखने में दक्षता का होना अति आवश्यक है क्योंकि पंचांग ज्योतिष का आधार स्तम्भ है. पंचांग की सहायता से कभी भी कुछ ही समय में प्रश्नकुंडली या जन्मकुंडली का निर्माण किया जा सकता है. दैनिक जीवन में उपयोगी कार्यों के मुहूर्त निकालने के लिए पंचांग की जानकारी जरूरी है.
पंचांग में पांच बातें विचारणीय मानी गई हैं – तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण. अंग्रेजी में इसे ‘अलमैनेक कहते हैं, अर्थात जंत्री, तिथि, पन्ना आदि. ज्योतिष शास्त्र का आधार है पंचांग. वास्तव में, पंचांग के द्वारा ही ज्योतिषीय गणनाएं संभव हो पाती हैं जिससे ज्योतिषी फलादेश कर पाते हैं. पंचांग की सहायता के बगैर पूर्णरूपेण फलादेश करना असम्भव होता है क्योंकि इसी के आधार पर ज्योतिषी ग्रह-नक्षत्रों की वर्तमान स्थिति देख कर आने वाले समय के बारे में बता पाते हैं, हालांकि वर्तमान समय में इस तरह की गणनाएं करने में कम्प्यूटर काफी उपयोगी एवं लोकप्रिय हो रहा है, फिर भी पंचांग की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता. साधारण पंचांग का नाम तो जानते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि इस पंचांग में मूल रूप से क्या-क्या विवरण होते हैं और किन कारणों से ये ज्योतिषियों के लिए इतना महत्वपूर्ण हो जाता है. इस आलेख में इसी सम्बन्ध में जानकारी दी जा रही है.
पंचांग का अर्थ होता है – पांच अंग. पंचांग में जिन पांच अंगों का विवरण होता है वे हैं – तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण. जिसमे इन पांचों का ज्ञान होता है वही पंचांग कहलाता है. पंचांग को पत्रा, जंत्री, पंजिका आदि नामों से भी जाना जाता है.
तिथि - सूर्य से चन्द्र को 12 अंश की दूरी पर जाने में जितना समय लगता है वह तिथि कहलाता है. यह चंद्रमा की एक कला होती है. प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी …… आदि से लेकर पूर्णिमा और अमावस्या तक तिथियां होती हैं. चन्द्र-कलाओं का घटता-बढ़ता क्रम शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का निर्माण करता है. एक माह में 30 तिथियां एवं दो पक्षों का समावेश होता है. चन्द्र की अस्थिर गति के करण तिथि-वृद्वि या क्षय होता है. पंचांग में तिथियों के बढ़ने-घटने का स्पष्ट उल्लेख रहता है जो व्रतोपवास, जन्मकुंडली के निर्माण, भविष्य-कथन आदि के लिए समय- गणना में उपयोगी होता है.
वार - वार अर्थात दिन का प्रारम्भ प्रत्येक धर्म में अलग-अलग माना जाता है, जैसे मुस्लिम लोग चंद्रोदय को महत्व देते हुए एक सूर्यास्त से अगले सूर्यास्त तक एक वार या दिन मानते हैं, जबकि ईसाई लोग मध्यरात्रि अर्थात रात के 12 बजे के बाद से अगले दिन का प्रारम्भ मानते हैं. आज संसार के अधिकांश देशों में रात्रि के 12 बजे के बाद ही अगला दिन मान लिया जाता है. परन्तु, हिन्दू धर्म में वार का प्रारम्भ सूर्योदय से होता है अर्थात एक सूर्योदय के बाद अगले सूर्योदय तक एक दिन अथवा वार होता है. चूंकि विभिन्न ऋतुओं में स्थानानुसार प्रतिदिन सूर्य के उदय होने के समय में परिवर्तन होता रहता है, अत: पंचांग में विभिन्न स्थानों के हिसाब से सूर्योदय के सही समय का उल्लेख रहता है.
नक्षत्र - आकाशमंडल को ज्योतिषीय गणना की सुविधा के लिए विभिन्न भागों में बांटा गया है. ये काल्पनिक भाग नक्षत्र कहलाते हैं. आकाश मंडल को कुल 27 भागों में बांटकर विभिन्न नाम दिए गए हैं, जैसे – अश्विनी, भरणी, कृतिका आदि. राशियां और अंश भी इन्हीं नक्षत्रों के आधार पर बने हैं. नक्षत्र-समूह के 12 भाग राशि और 360 अंश किये गए हैं. ये नक्षत्र-समूह अपनी गति के आधार पर पृथ्वी के चारों ओर घूमते रहते हैं और प्राणी जगत को प्रभावित करते हैं. इनकी गति एवं स्थिति का वर्णन पंचांग में रहता है. प्रश्न उपस्थित होता है कि आकाशमंडल में तो नक्षत्र प्रत्येक समय उपस्थित रहते हैं तो इस बात का क्या अर्थ है कि अमुक के जन्म समय अमुक नक्षत्र था. वास्तव में, किसी के जन्म के समय किसी विशेष नक्षत्र का होना यह बताता है कि उस समय चन्द्र इस विशेष नक्षत्र में था. इस प्रकार, पंचांग में बताये गए नक्षत्र यह बताते हैं कि अमुक/दिन समय में चन्द्र किस नक्षत्र में रहेगा. इन नक्षत्रों का प्रयोग ब्राह्मण नवजात शिशु का प्रथम नामाक्षर रखने में करते हैं.
योग - योग का शाब्दिक अर्थ होता है – जोड़. यह सूर्य और चन्द्र की गति के आधार पर होता है. अर्थात सूर्य और चन्द्र की भ्रमण गति का जोड़ ही योग है. इनकी संख्या कुल 27 है जो इस प्रकार है – विष्णुकुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगंड, सुकर्मा, धृति, शूल, गंड, वृद्वि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्वि, व्यतिपात, वरीयान, परिध, शिव, सिसि, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र और वैधृति, इन विभिन्न योगों के फल भी भिन्न-भिन्न होते हैं जिनके आधार पर विविध प्रकार के फलादेश किये जाते हैं. जैसे – उपरोक्त में से व्यतिपात, वैधृति, परिध, व्याघात, विषकुम्भ, शूल, गंड, अतिगंड आदि योगों के कुछ भाग शुभ कार्यों के लिए त्याज्य माने जाते हैं. इनके अतिरिक्त विभिन्न वारों, तिथियों एवं नक्षत्रों के योग से भी कुछ योग बनते हैं, जैसे- सिद्वि, अमृत, सुसिद्वि, सर्वार्थ, मृत्यु, काल, यमघंट, उत्पात, मूसल, चर और कृकच. इनमें से सिद्वि, अमृत, सुसिद्वि और सर्वार्थ योग शुभ हैं जबकि शेष अशुभ. कुछ अन्य योग भी होते हैं जो इस प्रकार हैं- आनंद, कालदंड, धूम्र, धाता, धौम्य, ध्वांक्ष, केतु, श्रीवत्स, वज्र, मुग्दर, छत्र, मित्र, मानस, पदम्, तुम्ब, कारण, शुभ, गद, मातंग, रक्ष, सुस्थिर, प्रवर्धमान, कुमार, राजयोग, द्विपुष्कर, त्रिपुष्कर आदि.
करण - प्रत्येक तिथि के दो भाग किये गए हैं. एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं. करण की कुल संख्या 11 है जिनमें से शकुनि, नाग, चतुष्पद, और किस्तुघ्न स्थिर करण माने जाते हैं तथा बव, बालव, कौलव, तैतिल, विष्टि, गर और वणिज चर कारण. इन करणों की पुनरावृति माह में कई बार होती है. उपरोक्त में से विष्टि नामक करण को ही ‘भद्रा’ कहा जाता है. भद्रा अशुभ मानी जाती है. इसमें सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं.
पंचांग परिचय -
भारतीय गणित के अनुसार प्रधान रूप से पांच प्रकार की गणना होती है – सौर, चन्द्र, सायन, नक्षत्र और बार्हस्पत्य.
1 (क). जितने समय में मेष आदि बारहों राशियों में सूर्य भोग करे उसे सौर वर्ष कहते हैं.
(ख). जितने दिन में मेष आदि प्रत्येक राशि का भोग करे, उसे सौर मास.
(ग). जितने काल में प्रत्येक राशि का एक-एक अंश भोग करे, उसे सौर दिन कहते हैं.
2. एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक चन्द्र मास कहते हैं.
3. एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के बीच को सायन दिन कहते हैं.
4. नक्षत्र 60 घड़ी के तुल्य होता है. एक वर्ष 365 दिन 15 घड़ी 30 पल साढ़े बाईस विपल का होता है.

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