योग

योग का महत्व
महर्षि पतंजली ‘योग’ शब्द का अर्थ चित्त की वृत्तियों के निरोध के रूप में करते हैं. गीता में योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग को विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया है. फिर भी गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति सहज परिस्थिति या विपरीत में, सफलता या विफलता में संभव बनाये रखता है, तो इस स्थिति को ही योग की संज्ञा दी जाती है. महर्षि पतंजलि के अनुसार योग के आठ अंग हैं :- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि.
यम :- जो अवांछनीय कार्यों से दूर कराये, उसे यम कहते हैं.
नियम :- जो शुभ कार्यों को करने के लिए प्रेरित करे उसे नियम कहा जाता है.
आसन :- जिस अवस्था में शरीर एक समय तक सुख से रह सके, उसे आसन कहते हैं. आसनों की संख्या अत्यधिक है, परन्तु हठयोग में 84 प्रकार के आसन बताये गए हैं. कुछ प्रमुख आसनों में पद्मासन, सिद्वासन, श्वासन, मयूरासन, भुजंगासन, शीर्षासन आदि को शुमार किया जाता है.
प्राणायाम :- श्वास-प्रवास को अत्यंत स्वाभाविक गति से नियंत्रित करने को प्राणायाम कहते हैं. प्राणायाम कर आप तन-मन से स्वस्थ रह सकते हैं.
प्रत्याहार :- इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से हटाकर उन्हें अंतर्मुखी बनाना ‘प्रत्याहार’ कहलाता है.
धारणा :- किसी स्थान या काल विशेष में चित्त की स्थिरता को धारणा की संज्ञा दी जाती है.
ध्यान :- ध्यान से मन को शांति मिलती है. ध्यान से चिंता व तनाव कम होता है और इससे मन को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है.
समाधि :- यह साधना की चरम स्थिति है. समाधि की अवस्था में व्यक्ति आत्मचेतना के साथ साक्षात्कार करने में सफल रहता है.
वज्रासन :- पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों में वज्रासन काफी फायदेमंद है. यही एक ऐसा आसन है, जिसका अभ्यास भोजन करने के उपरांत भी किया जा सकता है.
विधि :- दोनों पैरों को सामने सीधे फैलाकर बैठ जायें. बाएं पैर को घुटने से मोड़ कर तलुवे को ऊपर की ओर रखते हुए बाएं नितम्ब के नीचे लगा दें. इसी प्रकार दायें पैर को घुटने से मोड़कर तलुवे को ऊपर की ओर रखते हुए दायें नितम्ब के नीचे लगा दें. इस स्थिति में दोनों पैरों के अंगूठे पास-पास रखते हुए एड़ियों को बाहर की ओर रखें, जिससे दोनों एड़ियों के बीच में आराम से बैठ सके. दोनों पैरों के घुटने मिलाकर हाथों को घुटनों के ऊपर रखकर शांत बैठें. इस स्थिति में सिर एवं रीढ़ सीधा रहना चाहिए. 10 सैकंड से 15 मिनट तक इस आसन का अभ्यास किया जा सकता है.
लाभ :- इस आसन का उपयोग ध्यानात्मक आसन के रूप में किया जा सकता है. जो व्यक्ति पद्मासन नहीं लगा सकते हैं, वे इस आसन में बैठकर प्राणायाम, ध्यान आदि का अभ्यास कर सकते है.
इस आसन का अभ्यास भोजन करने के बाद भी किया जा सकता है. इसके अभ्यास से पाचन शक्ति को बढ़ने में मदद मिलती है जठराग्नि के प्रदीप्त होने के कारण उदर वायु विकार दूर होते हैं. आसन के अभ्यास से जांघों एवं पिंडलियों की मांसपेशियों पर तनाव पड़ता है, जिससे यह सुडौल और सशक्त बनती है. घुटनों, टखनों, पैर की अंगुलियों का व्यायाम होने से इनके दर्द दूर होते हैं.
वज्रासन पेल्विस वाले भाग को प्रभावित करता है. इस आसन को करने से एकाग्रता बढ़ती है.

योग क्या है और क्या नहीं ?
योग एक बहुत गहन विषय है. योग के वास्तविक मर्म को समझने से पूर्व उसके विषय में प्रचलित भ्रांतियों और शंकाओं का निराकरण आवश्यक है अत: पहले यह जानना जरुरी है कि योग क्या नहीं है.
धर्म नहीं है योग
योग धर्म नहीं है क्योंकि उसका प्रचलित धार्मिक धारणाओं या विश्वासों से कोई सरोकार नहीं है. योग हिन्दुओं की खोज है. यह मात्र संयोगिक है. इसका अर्थ यह नहीं केवल हिन्दू ही योगी हो सकते हैं. वे उतने ही योगी हो सकते हैं जितना कोई मुसलमान, ईसाई, जैन अथवा बौद्व व्यक्ति योगी हो सकता है.
दर्शन नहीं है योग
योग दर्शन नहीं है क्योंकि उसमें चिंतन-मनन, तर्क-वितर्क, खंडन-मंडन आदि क्रियाएं समाहित नहीं हैं. ये क्रियाएं तो दार्शनिक अनुशाशन का हिस्सा हैं. योग न तो किसी दर्शन का खंडन करता है न किसी दर्शन की स्वीकारोक्ति. इसके परिप्रेक्ष्य में कुछ सोचने विचारने की कहीं कोई गुंजाईश ही नहीं है. यह तो एक साधना है. जो सतत मानवीय चेष्टाओं और उसके परिष्कार का प्रतिफल है.
चिकित्सा शास्त्र नहीं है योग
अधिकांश लोग सोचते हैं कि योग के द्वारा रोग को भगाया जा सकता है. बहुत से लोग तो योग को ही चिकित्सा की एक शाखा मान बैठे हैं. योग की कोई औपचारिकता प्रबंध प्रणाली नहीं है. योग रुग्ण व्यक्तियों का पाथेय नहीं, स्वस्थ लोगों की जीवन चर्या है.
आशा और निराशा से दूर है योग
आशा निराशा तो मानव मन की स्थितियां हैं जिन्हें मन सतत सहेजे रहता है. कुछ मिलने की संभावना दिखाई दे तो आशा की किरण नहीं तो सर्वत्र निराशा का घटाटोप अंधेरा. योग का इनसे भी कोई सरोकार नहीं. योग तो स्वयं मन का ही अतिक्रमण है जहां न तो आशा है न निराशा.
आस्तिक और नास्तिक से दूर है योग
आस्तिक और नास्तिक भावों का योग से कोई मतलब नहीं है. आस्तिक ईश्वर की सत्ता को मानता है. जबकि नास्तिक ईश्वर और उसकी सत्ता को अस्वीकृति करता है. योग ईश्वरीय सत्ता के विषय में कुछ नहीं कहता.
योग क्या है ?
योग शब्द संस्कृत भाषा के युज से व्यत्पन्न है जिसका अर्थ है – जोतना अथवा जोड़ना. इस शब्द में योग संयुक्त करने (जोड़ने) की एक विधि है. सवाल यह है कि कैसे जोड़ता है. किससे जोड़ना. किस उद्देश्य से प्रेरित होकर जोड़ना, यह योजन साध्य है अथवा साधन. इन प्रश्नों पर भारतीय परम्परा में गहन मनन चिंतन हुआ है. योग के सम्बन्ध में सर्वाधिक मौलिक योगदान पंतजलि के योग का है. पंतजलि ने योग सूत्र की सरंचना की. योग सूत्र के रूप में यौगिक प्रक्रिया को पंतजलि का योगदान अप्रमित है. पंतजलि ने सर्वप्रथम यह अनुभूति जगाई कि योग रूपी विधियों द्वारा किस प्रकार कोई साधना धार्मिक व्यक्ति पदार्थ की दुनिया में लिप्त ‘आत्म’ को संसार से वापस खींच सकता है. और किस प्रकार वह पहले पदार्थ को उसकी मौलिक प्रकृति अवस्था में रूपांतरित करके उसके द्वारा अपनी विशुद्व प्रकृति को उपलब्ध कर पूर्ण स्वतंत्रता का आनंद जुटा पाता है. अतएव योग आत्म-उपलब्धि की वे विधियां बनकर प्रकट होता है. जो व्यक्ति को उसकी पूर्णता उपलब्ध कराती है. इन परिपूर्णताओं द्वारा आत्म सर्वात्म बन जाता है. सब एक हो जाता है. भाग पूर्ण से जुड़ जाता है. बूंद सागर बन जाती है. पेड़ अरण्य हो जाता है. इस सर्वात्म भाव से व्यक्ति और प्रकृति में सहज सामंजस्य प्रकट होता है. और उससे वह सर्वात्म चेतना प्रकट होती है. जो समूचे प्रकृति की लीलाओं को सिद्व व युक्त व्यक्त में प्रतिबिंबित करती है. घर का दिया प्रकाश का पर्याय हो जाता है. और स्वयं योगी की द्रष्टि सूरज बन जाती हैं. यही योग है.
योग प्रक्रिया उसके व्यवहारिकता, अपरहार्यता तथा प्रसांगिकता आदि को समेट ये योग सूत्र किसी भी योगाभ्यासी के लिए विविध स्तरीय प्रकाश स्तम्भ हैं. कुछ योग-सूत्रों पर ध्यान दें -
अथ योगानुशासनम (अब योग का अनुशासन)
इस का अर्थ है एक ऐसी सुनिश्चित अवस्था जहां सब कुछ निराशा व व्यर्थता से घिर जाये, कहीं से भी आशा की कोई भी किरण अवतरित न हो सके, पूर्ण मोह भंग की स्थिति उपस्थित हो. यदि यह नहीं तो योग का अनुशासन भी नहीं.
अनुशासन क्या है ?
अनुशासन का निहितार्थ है सब तरफ से टूटकर अपने मूल केंद्र में सिमटना. केन्द्रीकरण-प्रक्रिया को सतत नियमित करना. उस प्रक्रिया में एक ऐसी अन्तस्थ व्यवस्था निर्मित होती है जो एकजुट केंद्र की रचना करती है. इसी के परिप्रेक्ष्य में व्यक्ति होने की क्षमता सीखने की क्षमता अर्जित करता है. अन्यथा वह नितांत अव्यवस्थित भीड़नुमा ही प्रकट होता है.
योगशिचत्तवृति निरोध (योग मन की समाप्ति है)
योग का अनुशासन एक सुनिश्चित अवस्था में तब उपलब्ध होता है जब मन समाप्त हो जाता है. मन की समाप्ति से आशय है मन की अराजक वृत्तियों पर अंकुश और अंतत: पूर्ण – विराम. मन शांत होगा तो शरीर भी अनुशासित हो जायेगा. गति से अलग शरीर और मन की समवेत स्थितियां व्यक्ति के अंतस केंद्र को प्रकट करने में सहायक होगी.
तदाद्रष्टु स्वरूपेअवस्थानम (तब साक्षी स्वयं में स्थापित हो जाता है)
जब योग का अनुशासन प्रभावी होता है और मन की समाप्ति हो जाती है तब व्यक्ति का उसके अंतस साक्षी से समाधान हो जाता है. अंतस साक्षी वह जो सिर्फ देखता है और केवल देखता ही रहता है. न वह कर्ता होता है और न विचारक. न उसकी वासनाएं जोर मारती हैं न ही मन की ऊर्जा . यह साक्षी भाव (सतत देखने का भाव ही शुद्वतम अस्तित्व है) यह जुड़ना अपने को सही पहचानना ही योग है.
वृत्तिसारुप्यमितरत्र (अन्य अवस्थाओं में मन की वृत्तियों के साथ तादात्म्य हो जाता है)
जहाँ मन का निरोध नहीं होता तो मन बना रहता है. जब मन बना रहता है तो व्यक्ति मन:स्थितियों से ही तादात्म्य बनाये रखने को विवश होता है. मन से प्रकट विचार-प्रवाह सतत चलते रहते हैं. और व्यक्ति उनकी लहरों पर सदैव उठता गिरता ही रहता है. सतत उठना गिरना ही उसकी नीयत बन जाती है और योग का विकल्प उपस्थित ही नहीं हो पाता. अत: योग अनिवार्य रूप से मन की समाप्ति है.
इन चार सूत्रों में सावयिक एकता स्थापित है. एक को दूसरे से विरत देखा ही नहीं जा सकता. योगानुशासन की एक सुनिश्चित अवस्था होती है. फल जब तक पके नहीं या सूखे नहीं तो वह पेड़ से टपक नहीं सकता. योग भी ठीक उसी प्रकार समय पूर्व नहीं घटित हो सकता. योग तब घटता है जब मन मर जाता है. केवल उसी स्थिति में भीतर की भीड़ छंटती है. और अंतस में व्याप्त अराजकता का साम्राज्य अस्त होता है. उसके बाद क्रमश: एकजुट केंद्र पूरे फोकस में आ पाता है. मन की समाप्ति और एकजुट केंद्र के प्रकट होने पर साक्षी भाव उदित होता है. बिना वासना के सिर्फ देखना और लगातार देखते जाना. बिना मन और मैं के जीवन जीना. सब कुछ करना लेकिन अहं और वासना की कलौंस लगाए बिना.
ग़ालिब इसी पर गौर करके यह लिख गए -
‘दुनियां में हूं दुनियां का तलबगार नहीं हूं,
बाजार से गुजरा हूं खरीददार नहीं हूं ‘

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