वास्तुशास्त्र

वास्तुशास्त्र सहायक है क्लेश दूर करने में


1. घर का प्रवेश द्वार यथा सम्भब पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए. प्रवेश द्वार के समक्ष सीढियाँ व रसोई नहीं होनी चाहिए. प्रवेश द्वार भवन के ठीक बीचों बीच में नहीं होना चाहिए. भवन में तीन दरवाजे एक सीध में न हो.
2. भवन में कांटेदार वृक्ष व पेड़ नहीं होने चाहिए ना ही दूध वाले पौधे – कनेर, आकड़ा केक्टस, बांसाई आदि. इनके स्थान पर सुगन्धित एवं खूबसूरत फूलों के पौधे लगायें.
3. घर में युद्व के चित्र, बंद घडी, टूटे हुए कांच तथा शयन कक्ष में पलंग के सामने दर्पण या ड्रेसिंग टेबल नहीं होनी चाहिए.
4. भवन में खिडकियों की संख्या सम तथा सीढियों की संख्या विषम होनी चाहिए.
5. भवन के मुख्य द्वार में दोनों तरफ हरियाली वाले पौधे जैसे तुलसी और मनीप्लांट आदि रखने चाहिए. फूलों वाले पौधें घर के सामने वाले आँगन में ही लगायें. घर के पीछे लगे होने से मानसिक कमजोरी को बढ़ावा मिलता है.
6. मुख्य द्वार पर मांगलिक चिन्ह जैसे स्वस्तिक, ॐ आदि अंकित करने के साथ साथ गणपति लक्ष्मी या कुबेर की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए.
7. मुख्य द्वार के सामने मंदिर नहीं होना चाहिए. मुख्य द्वार की चौड़ाई हमेशा ऊंचाई की आधी होनी चाहिए.
8. मुख्य द्वार के समक्ष वृक्ष, स्तम्भ, कुंआ तथा जल भण्डारण नहीं होना चाहिए. द्वार के सामने कूड़ा, करकट और गंदगी एकत्र न होने दे यह अशुभ और दरिद्रता का प्रतीक हैं.
9. रसोई घर आग्नेय कोण अर्थात दक्षिण पूर्व दिशा में होना चाहिए. गैस सिलेंडर व अन्य अग्नि स्त्रोतों तथा भोजन बनाते समय गृहणी की पीठ रसोई के दरवाजे की तरफ नहीं होनी चाहिए. रसोईघर हवादार एवं रोशनीयुक्त होना चाहिए. रेफ्रिजरेटर के ऊपर टोस्टर या माइक्रोवेव ओवन ना रखे. रसोई में चाकू स्टैंड पर खड़ा नहीं होना चाहिए. झूठें बर्तन रसोई में न रखें.
10. ड्राइंग रूम के लिए उत्तर दिशा उत्तम होती है. टी.वी., टेलीफोन व अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरण दक्षिण दिशा में रखें. दीवारों पर कम से कम कीलें प्रयुक्त करें. भवन में प्रयुक्त फर्नीचर पीपल, बड़, अथवा बहेड़े के वृक्ष की लकड़ी का नहीं होना चाहिए.
11. किसी कौने में अधिक पेड़-पौधे ना लगाए इसका दुष्प्रभाव माता-पिता पर भी होता है वैसे भी वृक्ष मिट्टी को क्षति पहुंचाते हैं.
12. पुरानी एवं बेकार वस्तुओं को घर से बाहर निकालें.
13. बेडरूम में डबल बैड पर दो अलग-अलग गद्दों के sthan पर एक ही गद्दा प्रयोग में लावें. यह तनाव को दूर करता है. दो गद्दे होने से तनाव होता है व संबंधों में दरार आकर बात तलाक तक पहुँच सकती है. शयन कक्ष में वाश बेसिन नहीं होना चाहिए. हाँ अटेच बाथरूम होने पर वाश बेसिन हो सकता है. शयन कक्ष में हिंसा या युद्व दर्शाता चित्र नहीं होना चाहिए. शयन कक्ष में पति-पत्नी का एक सयुंक्त चित्र हँसते हुए लगाना चाहिए. शयन कक्ष में कांच आदि नहीं होने चाहिए. नकारात्मक ऊर्जा बढती है. गुलाबी रंग का उपयोग करें. शयन कक्ष में क्रिस्टल बाल व लव बर्ड का प्रयोग करने से प्यार व रोमांस बढ़ता है तथा संबंधों में मधुरता आती है तथा एक दूसरे के प्रति विश्वास में प्रगाढ़ता आती है. शयन कक्ष दक्षिण पश्चिम दिशा में सर्वोत्तम है. शयन के समय सिर दक्षिण में होना चाहिए इससे शरीर स्वस्थ्य रहता है तथा नींद अच्छी आती है.
14. झाड़-फानूस लगाने से अविवाहित युवक-युवती का विवाह शीघ्र हो जाता है. इसके साथ ही अविवाहित युवक-युवती को पूर्व दिशा में सिर रखकर शयन करना चाहिए.
15. क्रिस्टल (स्फटिक) की माला का प्रयोग करें. क्रिस्टल की वस्तुओं का प्रयोग करें जैसे- पैंडल, माला, पिरामिड, शिवलिंग, श्रीयंत्र आदि.
16. मोती का प्रयोग करें. यह तन-मन को निरोगी एवं शीतल रखता हैं. घर में तनाव उत्त्पन्न नहीं होगा.
17. घर का मुख्य द्वार छोटा हो तथा पीछे का दरवाजा बड़ा हो तो वहां के निवासी गंभीर आर्थिक संकट से गुजर सकते हैं.
18. घर का प्लास्टर उखड़ा हुआ नहीं होना चाहिए चाहे वह आँगन का हो, दीवारों का या रसोई अथवा शयन कक्ष का. दरवाजे एवं खिडकियां भी क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए. मुख्य द्वार का रंग काला नहीं होना चाहिए. अन्य दरवाजों एवं खिड़की पर भी काले रंग के इस्तेमाल से बचें.
19. मुख्य द्वार पर कभी दर्पण न लगायें. सूर्य के प्रकाश की ओर कभी भी कांच न रखे. इस कांच का परिवर्तित प्रकाश आपका वैभव एवं ऐश्वर्य नष्ट कर सकता है.
20. घर में जगह-जगह देवी देवताओं के चित्र प्रतिमाएं या केलेन्डर न लगाएं.
21. घर में भिखारी, वृद्वों या रोते हुए बच्चों के चित्र व पोस्टर आदि न लगाएं. ये गरीबी, बीमारी या दुःख दर्द का आभास देते हैं. इनके स्थान पर खुशहाली, सुख समृद्वि एवं विकास आदि का आभास देने वाले चित्र व पोस्टर लगाएं.
22. घर एवं कमरे की छत सफ़ेद होनी चाहिए, इससे वातावरण ऊर्जावान बना रहता है.
23. पूजा कक्ष पूर्व दिशा या ईशान (उत्तर पूर्व) में होना चाहिए. प्रतिमाएं पूर्व या पश्चिम दिशा में स्थापित करें. सीढियों के नीचे पूजा घर कभी नहीं बनावे. एक से अधिक मूर्ति (विग्रह) पूजा घर में ना रखे.
24. धनलाभ हेतु जेवर, चेक बुक, केश बुक, ए.टी.एम. कार्ड, शेयर आदि सामग्री अलमारी में इस प्रकार रखें कि अलमारी प्रयुक्त करने पर उसका द्वार उत्तर दिशा में खुले. अलमारी का पिछवाड़ा दक्षिण दिशा में होना चाहिए.
25. बरामदा हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में तथा बालकनी उत्तर पूर्व में रखनी चाहिए.
26. भवन में सीढियाँ पूर्व से पश्चिम या दक्षिण अथवा दक्षिण पश्चिम दिशा में उत्तम रहती है. सीढियाँ कभी भी घुमावदार नहीं होनी चाहिए. सीढियों के नीचे पूजा घर और शौचालय अशुभ होता है. सीढियों के नीचे का स्थान हमेशा खुला रखें तथा वहां बैठकर कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए.
27. पानी का टेंक पश्चिम में उपयुक्त रहता है. भूमिगत टंकी, हैण्डपम्प या बोरिंग ईशान (उत्तर पूर्व) दिशा में होने चाहिए. ओवर हेड टेंक के लिए उत्तर और वायव्य कोण (दिशा) के बीच का स्थान ठीक रहता है. टेंक का ऊपरी हिस्सा गोल होना चाहिए.
28. स्नानघर पूर्व दिशा में ही बनवाएं यह ध्यान रखें की नल की टोटियों से पानी न टपके न रिसे, यह अशुभ होता है.
29. शौचालय की दिशा उत्तर दक्षिण में होनी चाहिए अर्थात इसे प्रयुक्त करने वाले का मुंह दक्षिण में व पीठ उत्तर दिशा में होनी चाहिए. मुख्य द्वार के बिल्कुल समीप शौचालय न बनावें. सीढियों के नीचे शौचालय का निर्माण कभी नहीं करवाएं यह लक्ष्मी का मार्ग अवरुद्व करती हैं. शौचालय का द्वार हमेशा बंद रखे. उत्तर दिशा, ईशान, पूर्व दिशा एवं आग्नेय कोण शौचालय या टेंक निर्माण कदापि न करें.
30. भवन में दर्पण हमेशा उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए.
31. घड़ी को उत्तर दिशा में टागना या रखना शुभ होता है.
32. पानी हमेशा उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके पिएं.
33. भोजन करते समय मुख पूर्व में रखना चाहिए.
34. भवन की दीवारों पर आई सीलन व दरारें आदि जल्दी ठीक करवा लेनी चाहिए क्योंकि यह घर के सदस्यों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं रहती.
35. घर की छत पर तुलसी को गमले में स्थापित करने से बिजली गिरने का भय नहीं रहता है.
36. घर के सभी उपकरण जैसे टीवी, फ्रिज, घड़िया, म्यूजिक सिस्टम, कंप्यूटर आदि चलते रहने चाहिए. ख़राब होने पर इन्हें तुरंत ठीक करवा ले क्योंकि बंद (ख़राब) उपकरण घर में होना अशुभ होता है.
37. भवन का ब्रह्म स्थान रिक्त होना चाहिए अर्थात भवन के मध्य कोई निर्माण कार्य नहीं करें.
38. बीम के नीचे न तो बैठें और न ही शयन करें. शयन कक्ष, रसोई एवं भोजन कक्ष बीम रहित होने चाहिए.
39. वाहनों हेतु पार्किंग स्थल आग्नेय दिशा में उत्तम रहता है क्योंकि ये सभी ऊष्म्यी ऊर्जा (ईधन) द्वारा चलते हैं.
40. भवन के दरवाजे व खिडकियां न तो आवाज करें और न ही स्वत: खुले तथा बंद हो.
41. एक ही दिशा में तीन दरवाजे एक साथ नहीं होने चाहिए.
42. व्यर्थ की सामग्री (कबाड़) को एकत्र न होने दें. घर में सामान को अस्त व्यस्त न रखें. अनुपयोगी वस्तुओं को घर से निकालते रहें.
43. भवन के प्रत्येक कोने में प्रकाश व वायु का सुगमता से प्रवेश होना चाहिए. शुद्व वायु आने व अशुद्व वायु बाहर निकलने की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए. ऐसा होने से छोटे मोटे वास्तु दोष स्वत: समाप्त हो जाते हैं.
44. अध्ययन करते समय मुख पूर्व, उत्तर या ईशान दिशा में होना चाहिए.
45. गृह क्लेश निवारण हेतु योग्य आचार्य से पित्र दोष शांति व कालसर्प योग निवारण करवाएं..
यूं तो सारे नियम महत्त्वपूर्ण है किन्तु रसोईघर, पानी का भण्डारण, शौचालय व सैप्टिक टेंक बनाते समय विशेष ध्यान रखें. इसके बावजूद भी यदि निर्माण करवाना पड़े तो पिरामिड के प्रयोग द्वारा बिना तोड़-फोड़ किये गृहक्लेश निवारण किया जा सकता है.

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