श्री राम नवमी

श्री राम नवमी व्रत एवं पूजन विधि
चैत्र शुक्ल नवमी को ‘श्री रामनवमी’ का व्रत होता है. यह व्रत मध्याहनव्यापिनी दशमी विद्वा नवमी को करना चाहिए. अगस्त्य संहिता में कहा गया है कि यदि चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त हो और वही मध्याहन के समय रहे तो महान पुण्यदायिनी होती है. अष्टमीविद्वा नवमी विष्णु भक्तों को छोड़ देनी चाहिए. वे नवमी में व्रत तथा दशमी में पारायण करें. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन स्वयं श्री हरि का रामावतार हुआ. पुनर्वसु नक्षत्र से संयुक्त नवमी तिथि सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली है. जो रामनवमी व्रत करता है, उसके अनेक जन्मार्जित पापों की राशि भस्मीभूत हो जाती है और उसे भगवान विष्णु का परम पद प्राप्त होता है. श्री राम नवमी व्रत से भुक्ति एवं मुक्ति दोनों की ही सिद्वि होती है. इस उत्तम व्रत को करके वह सर्वत्र पूज्य होता है. श्री रामनवमी के दिन प्रात:काल नित्यकर्म से निवृत होकर अपने घर की उत्तर भाग में एक सुन्दर मंडप बना लें. मंडप के पूर्व द्वार पर शंख, चक्र तथा श्री हनुमान जी की स्थापना करें. दक्षिण द्वार पर बाण, शार्गधनुष तथा श्री गरुण जी की, पश्चिम द्वार पर गदा, खडग और श्री अंगद जी की एवं उत्तर द्वार पर पद्य, स्वास्तिक और श्रीनील जी की स्थापना करें. बीच में चार हाथ के विस्तार की वेदिका होनी चाहिए, जिसमे सुन्दर वितान एवं सुन्दर तोरण लगे हों. इस प्रकार तैयार किये गए मंडप के मध्य में परिकरों सहित भगवान श्रीसीताराम को प्रतिष्ठित कर विविध उपचारों से यथाविधि पूजन करें.

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