होली

होली
होली एक सामाजिक और धार्मिक त्यौहार है, वहीं यह रंगों का त्यौहार भी है. बड़े-बूढ़े, नर-नारी, बच्चे सभी इसे बड़े उत्साह से मानते हैं. यह एक देशव्यापी त्यौहार है. इस त्यौहार में खेत से नए अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परम्परा भी है. उस अन्न को होला कहते हैं. इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा. होलिकोत्सव मनाने के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं. यहां कुछ प्रमुख मतों का उल्लेख किया है -
ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का सम्बन्ध ‘काम-दहन’ से है. भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था. तभी से इस त्यौहार का प्रचलन हुआ.
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यन्त आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है. भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े बांधते हैं. इस शाखा को जमीन में गाढ़ दिया जाता है. सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव मनाते हैं.
यह त्यौहार हिरण्यकशिपु की बहन की स्मृति में भी मनाया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि हिरण्यकशिपु की बहन होलिका वरदान के प्रभाव से नित्य प्रति अग्नि-स्नान करती और जलती नहीं थी. हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन से प्रहलाद का गोद में लेकर अग्नि-स्नान करने को कहा. उसने समझा था कि ऐसा करने से प्रहलाद जल जायेगा तथा होलिका बच निकलेगी. हिरण्यकशिपु की बहन ने ऐसा ही किया, होलिका तो जल गयी, किन्तु प्रहलाद जीवित बच गये. तभी से इस त्यौहार के मनाने की प्रथा चल पड़ी.
इस दिन आम्रमंजरी तथा चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा महात्म्य है. कहते हैं जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते हुए श्री गोविन्द पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं. वे निश्चय ही बैकुण्ठलोक में वास करते हैं.
भविष्य पुराण में कहा गया है कि एक बार नारदजी ने महाराज युधिष्ठर से कहा – राजन ! फाल्गुन की पूर्णिमा के दिन सब लोगों को अभयदान देना चाहिए, जिससे सम्पूर्ण प्रजा उल्लासपूर्वक रहे. बालक गांव के बाहर से लकड़ी-कंडे इत्यादि लाकर ढ़ेर लगायें. होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत पूजन करें. होलिका दहन करें. ऐसा करने से सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं.

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