Archive for April 8, 2010

मृत्यु से पहले निकलती है – मृत्यु गंध

Written by sdmadan. Posted in लेख

 पराविज्ञान जगत में यह एक आम धारणा है की मृत्यु से पहले कुछ लोगों को अपनी ही मृत्यु का पूर्वाभास हो जाता है. ज्योतिष में इस सन्दर्भ में लिखा गया है की जब जन्म कुंडली में अष्टम भाव का स्वामी शुभ स्थिति में बृहस्पति  की द्रष्टि या प्रभाव में होता है तो  ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पूरे होश – हवाश में सुखपूर्वक होती है. तथा उसे मृत्यु से पूर्व मृत्यु होने का पूर्वाभास भी जाता है. एक आम भारतीय लोक धारणा है की जिस घर की और मुंह करके अकारण ही कुत्ता रोता है उस घर में किसी की मृत्यु होटी है. ऐसे घर में कोई गंभीर बीमार हो तो उसके जल्दी ही मरने  का संकेत कुत्ते के रोने से मिल जाता है. नई खोजों से यह बात सामने आई है की मृत्यु से पहले एक विशेष गंध आने लगाती है. जिसे मृत्यु गंध के नाम से जाना जाता है. वैज्ञानिकों के लिए यह मृत्यु गंध अभी भी एक पहेली  बनी हुई है. अमेरिका के प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक फोड़ो ने दावा किया था की न्यू यार्क में रहने वाली एक महिला में मृत्यु गंध को सूंघकर मौत से पहले ही मृत्यु की भविष्यवाणी  करने की अद्भुत क्षमता थी. परा जगत की इसी गुत्थियों को सुलझाने में वैज्ञानिक अभी तक नाकाम रहे है. पाठक जानते हैं की पशु – पक्षियों के पास सूंघने, प्राकृतिक परिवर्तनों को भांपने की क्षमता मानव से बहुत ज्यादा होती है. यदि इस दिशा में शोध किया जाये तो निश्चित ही चमत्कारी परिणाम सामने आ सकते हैं.  
 

स्त्री सौन्दर्य की परीक्षा

Written by sdmadan. Posted in लेख

नारी के सौन्दर्य की परीक्षा हेतु बीस वर्ष की आयु ही प्रशस्त होती है. इसके पूर्व शारीर का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पता है. हमारे शाश्त्रों में स्त्री की भूरीभूरी प्रशंसा की है. उनके अनुसार स्त्री रत्नों को भूषित करती है किन्तु रत्न स्त्री को भूषित नहीं करते हैं.

आचार्य वराहमिहिर कहते हैंचन्द्रमा ने स्त्रियों को पवित्रता, गन्धर्वों ने शिक्षित वचन, अग्नि देव ने सर्वभक्षित्व का गुण दिया है. अतः ये सब गुण स्वर्ण में होने से स्त्रियाँ भी स्वर्ण तुल्य होती हैं.

सुन्दर चरणजिस स्त्री के पैर चिकने, उन्न्तोद्खाली पगतली से युक्त, लाल नाखूनों से युक्त हों तथा जिनके टखने मांसल हों. अँगुलियों के बीच में अंतर हो वे सटी हुई हों तथा कमल के सामान काँटी वाले पैर हों वे सुन्दर होते हैं.

नितम्ब और नाभि की सुन्दरताआचार्य वराहमिहिर ने कहा है की जिन स्त्रियों के स्तम्ब विस्तीर्ण , मांसल तथा पुष्ट हों बालों के जूड़े युक्त हों, जिनकी नाभि गंभीर, विस्तीर्ण और दक्षिण की और घुमाव वाली हो वे स्त्रियाँ सुन्दर होती हैं. …. [ अधिक जानकारी के लिए ग्रह शक्ति का जुलाई २००४ अंक पढ़ें ]

 

 

 

 

तिल सुन्दरता ही नहीं सौभाग्य भी देते हैं

Written by sdmadan. Posted in हस्तरेखा शास्त्र

तिल प्राय: हर व्यक्ति के शरीर पर होते हैं. तिल शरीर की सुन्दरता को बढ़ाते हैं. कुछ निश्चित स्थान के तिल शरीर को आकर्षक बनाते हैं. प्रकृति व्यक्ति के शरीर पर ग्रह जनित प्रभाव को विभिन्न शारीरिक चिन्ह जैसे भंवरी, लहसन, मस्सा आदि से व्यक्त करती है. यह बात इतनी निश्चित है की यदि किसी व्यक्ति के मस्तिष्क पर दाहिनी और तिल हो तो उसके पेट या भुजा पर दाहिनी और तिल अवश्य होगा. इस प्रकार का तिल दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनता है. गाल पर तिल हो तो कूल्हे पर तिल अवश्य होगा. इस तिल का फल है की जीवन ठीक चलता है. यदि निचले होंठ पर तिल हो तो घुटने पर तिल अवश्य होता है. यदि थोड़ी पर तिल हो तो पुट्ठे पर तिल अवश्य होगा. यदि कनपटी पर तिल हो तो कांख पर तिल अवश्य होगा….  [ अधिक जानकारी के लिए ग्रह शक्ति का जुलाई २००४ अंक सौन्दर्य विशेषांक अवश्य पढ़ें. ]

वास्तु शास्त्र – प्राकृतिक शक्तियों का संतुलन

Written by sdmadan. Posted in वास्तु

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का आधार प्राकृतिक शक्तियों को अधिकाधिक अनुकूल बनाना है. सुखएश्वर्य से परिपूर्ण जीवन के लिए स्वस्थ शरीर एवं मन का होना आवश्यक है. स्वस्थ मन एवं शरीर होने के लिए आवश्यक है की उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से प्रवाहित होने वाली चुम्बकीय तरंगें मानव जीवन को संचालित करने वाली प्राण शक्ति को प्रवर्धित करे. नियमों की वैज्ञानिकता को इस प्रकार समझा जा सकता हैवास्तु के नियमों में पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है. पूर्व दिशा की और भूखंड, मुख्य द्वार , खिड़कियाँ, रोशनदान होना शुभ मन गया है. ये नियम इसलिए बनाये गए हैं. ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणे अधिकाधिक मिल सकें. वज्ञानिकों के अनुसार सूर्य की जीवनदायिनी किरणों में विटामिन और विटामिन डी एवं विटामिन f मिलाता है. जो की स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है. दोपहर के बाद सूर्य की किरणे इन्फ्रारेड किरणे उत्पन्न करती हैं. जो की स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. यही कारण है की वास्तु शास्त्र में ऊँचे एवं बड़े वृक्षों को भवन के पश्चिम दिशा की और लगाना बताया गया है. ताकि अशुभ प्रभाव करक इन्फ्रारेड किरणों से बचाव हो सके. इस तरह हम समझ सकते हैं की वास्तु शास्त्र के नियम प्राकृतिक ऊर्जा के अनुकूल सामंजस्य के वज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित हैं.

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