Archive for February 2, 2011

वसंत पंचमी

Written by pradeep. Posted in Other Topics, Trial, अंक ज्योतिष, उपाय, ज्योतिष, तंत्र, धर्म, नक्षत्र, पंचांग, मंत्र, मुहुर्त, यन्त्र, राशिफल, लाल किताब, लेख, वास्तु, व्रत,पर्व ऑर त्योहार, संस्कृति, समाचार

वसंत पंचमी को उमंग, विद्या, बुद्धि और ज्ञान के समन्वय का पर्व माना गया है। वास्तव में यह सच भी है क्योंकि मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान व विवेक की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनसे हम वसंत पंचमी के दिन विवेक व बुद्धि प्रखर होने, वाणी मधुर व मुखर होने की कामना करते हैं। पुराणों के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन ब्रह्मा जी के मुख से मां सरस्वती का प्राकट्य हुआ था और जड़-चेतन को वाणी मिली थी। इसीलिए वसंत पंचमी को ‘विद्या जयंती’ भी कहा जाता है और इस दिन ‘सरस्वती पूजा’ का विधान है।

‘वसंत पंचमी’ पर हम ऋतुओं के राजा ‘वसंत’ का स्वागत करते हैं। मनुष्य ही नहीं, जड़ और चेतन प्रकृति भी इस महोत्सव के लिए श्रृंगार करने लगती है। सबके मन और देह में नई शक्ति व ऊर्जा की अनुभूति होती है। तरह-तरह के फूल खिलने लगते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने दसवें अध्याय के 35वें श्लोक में ‘वसंत ऋतु’ को अपनी विभूति बताया है। उन्होंने कहा है कि वसंत ऋतु मैं ही हूं। मैं मासों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत हूं।

‘पद्मपुराण’ में वर्णित मां सरस्वती का रूप प्रेरणादायी है। वे शुभ्रवस्त्र पहने हैं। उनके चार हाथ हैं, जिनमें वीणा, पुस्तक और अक्षमाला है। उनका वाहन हंस है। शुभ्रवस्त्र हमें प्रेरणा देते हैं कि हम अपने भीतर सत्य अहिंसा, अक्रोध, क्षमा, सहनशीलता, करुणा, प्रेम व परोपकार आदि सद्गुणों को बढ़ाएं और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अहंकार आदि दुर्गुणों से स्वयं को बचाएं। चार हाथ हमारे मन, बुद्धि, चित्ता, अहंकार रूपी अंत:करण चतुष्ट्य का प्रतीक हैं। पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है, अक्षमाला हमें अध्यात्म की ओर प्रेरित करती है। दो हाथों में वीणा हमें ललित कलाओं में प्रवीण होने की प्रेरणा देती है। जिस प्रकार वीणा के सभी तारों में सामंजस्य होने से लयबद्ध संगीत निकलता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन में मन व बुद्धि का सही तारतम्य रखे, तो सुख, शांति, समृद्धि व अनेक उपलब्धियां प्राप्त कर सकता है। सरस्वती का वाहन हंस ‘विवेक’ का परिचायक है। विवेक के द्वारा ही अच्छाई-बुराई में अंतर करके अच्छाई ग्रहण की जा सकती है।

आज अभावों व कुंठाओं में कभी-कभी जिंदगी की कशमकश इस वासंती रंग को फीका करने लगती है। तो क्यों न हम वसंत से प्रेरणा लेकर जीवन को संपूर्णता से जिएं और कामना करें कि सबके जीवन में खुशियों के फूल सदा खिलते रहें।जीवन में वसंत ऋतु जैसा उल्लास व सुंदरता बनी रहे

फरवरी 2011 – व्रत एवं पर्व

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1 फरवरी: मासिक शिवरात्रि व्रत, नरकनिवारण चतुर्दशी व्रत (मिथिलांचल)

2 फरवरी: मौनी अमावस, गंगा-स्नान मेला (प्रयाग), द्वापरयुगादि तिथि

3 फरवरी: स्नान-दान की अतिरिक्त मौनी अमावस्या, महोदय योग प्रात: 8 बजे तक, त्रिवेणी अमावस (उड़ीसा)

4 फरवरी: नवीन चंद्र-दर्शन, गुप्त नवरात्र प्रारंभ

5 फरवरी: बाबा रामदेव बीज (राजस्थान)

6 फरवरी: गौरी तृतीया (गोंतरी), सरस्वती तृतीया (जम्मू-कश्मीर)

7 फरवरी: वरदविनायक चतुर्थी व्रत, तिल चतुर्थी, कुन्द चतुर्थी

8 फरवरी: वसंत पंचमी, श्रीपंचमी, सरस्वती-पूजा (बंगाल), श्रीश्यामसुंदरदेव का प्राकट्योत्सव एवं विवाहोत्सव (वृंदावन), तक्षक पूजा, रतिकाम महोत्सव

9 फरवरी: शीतलाषष्ठी (बंगाल), दरिद्रताहरण व्रत, मंदारषष्ठी व्रत, वैधृतिपात महापात प्रात: 8.17 से दिन 2.08 तक

10 फरवरी: सूर्यरथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी व्रत, पुत्रसप्तमी व्रत

11 फरवरी: श्रीदुर्गाष्टमी व्रत, श्री अन्नपूर्णाष्टमी व्रत

12 फरवरी: श्रीमहानंदा नवमी व्रत, शिशिर नवरात्र पूर्ण,

13 फरवरी: माघी विजयादशमी (मिथिलांचल, मालवा), शल्य दशमी, श्रीराधादामोदरदेव का प्राकट्योत्सव, कुम्भ-संक्रान्ति प्रात: 7.41 बजे, स्नान-दान का पुण्यकाल दिन 2.05 बजे तक

14 फरवरी: जया एकादशी व्रत, Valentine’s Day

15 फरवरी: वाराह द्वादशी, संतान द्वादशी व्रत, तिल द्वादशी

16 फरवरी: प्रदोष व्रत, बारहवफात-ईद ए मिलाद (मुस.), गुरु गोरखानाथ जयंती

17 फरवरी: पूर्णिमा व्रत, श्रीसत्यनारायण व्रत-कथा

18 फरवरी: स्नान-दान की माघी पूर्णिमा, राजराजेश्वरी ललिता महाविद्या जयंती

19 फरवरी: सौर वसन्त ऋतु प्रारंभ

20 फरवरी: मोढेश्वरी माता प्राकट्योत्सव

21 फरवरी: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत,

22 फरवरी: श्रीमहाकालेश्वर नवरात्र प्रारंभ (उज्जयिनी)

23 फरवरी: यशोदा माता जयंती

24 फरवरी: श्रीनाथजी का पाटोत्सव (श्रीनाथद्वारा), कालाष्टमी व्रत

25 फरवरी: श्रीसीताष्टमी व्रत

26 फरवरी: समर्थ गुरु श्रीरामदास जयंती

27 फरवरी: स्वामी दयानंद सरस्वती जयंती

28 फरवरी: विजया एकादशी व्रत

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City of Mathura
The City of Mathura, in Uttar Pradesh, the nucleus of Brajbhoomi, is located at a distance of 145 km south-east of Delhi and 58 km north-west of Agra. Covering an area of about 3,800 sq. km., today, Brajbhoomi can be divided into two distinct units – the eastern part in the trans-Yamuna tract with places like Gokul, Mahavan, Baldeo, Mat and Bajna and the western side of the Yamuna covering the Mathura region that encompasses Vrindavan, Govardhan, Kusum Sarovar, Barsana and Nandgaon.
The land of Braj starts from Kotban near Hodel about 95 km from Delhi and ends at Runakuta which is known specially for its association with the poet Surdas, an ardent Krishna devotee.
Shri Krishna, an incarnation of Lord Vishnu, was born in the Dwapara Yuga as the eighth son of the Yadava prince Vasudev and his wife Devaki. To save him from the murderous intentions of his maternal uncle Kansa, the ruler of Mathura, the infant Krishna was spirited away soon after birth to Gokul, the village of the gopas (cowherds) in Braj (their pastureland). It was here that he grew to manhood, in the tender care of his foster parents Nand and Yashoda in the happy company of the cowherds

ब्रज चौरासी कोस यात्रा

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* त्रेता युग में प्रभु राम के लघु भ्राता शत्रुघ्न ने मधु पुत्र लवणासुर को मार कर ब्रज परिक्रमा की थी। गली बारी स्थित शत्रुघ्न मंदिर यात्रा मार्ग में अति महत्व का माना जाता है।
* द्वापर युग में उद्धव जी ने गोपियों के साथ ब्रज परिक्रमा की।
* कलि युग में जैन और बौद्ध धर्मों के स्तूप बैल्य संघाराम आदि स्थलों के सांख्य इस परियात्रा की पुष्टि करते हैं।
* 14वीं शताब्दी में जैन धर्माचार्य जिन प्रभु शूरी की में ब्रज यात्रा का उल्लेख आता है।
* 15वीं शताब्दी में माध्व सम्प्रदाय के आचार्य मघवेंद्र पुरी महाराज की यात्रा का वर्णन है तो
* 16वीं शताब्दी में महाप्रभु वल्लभाचार्य, गोस्वामी विट्ठलनाथ, चैतन्य मत केसरी चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, नारायण भट्ट, निम्बार्क संप्रदाय के चतुरानागा आदि ने ब्रज यात्रा की थी।

मथुरा के प्रमुख ज्योतिषी

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मथुरा के प्रमुख ज्योतिषी
पंडित बनवारी लाल पाठक
पंडित रवीन्द्र नाथ चतुर्वेदी
प्रदीप कुमार सक्सेना
लखन परिहार

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