What the 12 houses signify ?

Written by sdmadan. Posted in अंक ज्योतिष, उपाय, धर्म

First House (lagna Bhava) :

 Health, Physical stature , colour and shape, vitality, habit of thinking, natural disposition and tendencies,personality and struggle for life, dignity , prosperity, head and upper part of face .

Second House :

Money matters, fortune, bank balance, stocks and shares, ones power and resources, jewellery, ability to express his thoughts, vision, family members,  death of individual, money lent – money borrow.  Right eye , memory, face, tongue, teeth, nose, cheeks and chin.

Third House :

Mental inclination, memory, intellect, courage, firmness,  inclination to study,younger brother and siser, cousins, neighbour, short travel, writing, accounting, communication, media, change of residence, rumours, carrying tales. hands, shoulder, coller bone, arms, nervous system.roadside place, confusion of the mind, edible roots and froots.

Fourth House :

Mother, residence, domestic environment, vehicles, real – estate, crops, agriculture, leraning, herbs& caves. vedic and secreat text. chest, education, water, milk, false allegation, entrance in a house.

Fift House :

progany,  inclination, pleasure, artistic talents and gains, entertainment, sports, romance, cinema, music, shares, lottery, gambling, stock exchange.love affair, kidnap, rape, discremination between virtue and sin.chanting of mantras and spritual practice. stomach child, son.

Sixth House :

sickness, disease, dietary habits,enmity, servants, small cattle, pet animals, dress and hygiene, maternal uncle, , insanity, theft, child born.

Seventh House :

leagal bondage, mix up freely in society, marriage, husband / wife personality, break of journey, partnership, danger to longivity, sex relation,

Eighth  House :

Money

Ninth  House :

Money

Tenth  House :

Money

Eleventh  House :

Money

Twelfth House :

Money

मंगल स्नान

Written by sdmadan. Posted in धर्म

जिस व्यक्ति पर मंगल ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा चल रही हो  उसे मंगल ग्रह को शुभ बनाने के लिए अग्रलिखित वस्तुओं को एकत्रित करके पानी में डालकर उस पानी से स्नान करना चाहिए. मंगल स्नान की वस्तुएं – सोंठ, सोंफ, मौलसिरी के फूल, सिंगरक, मॉल कंगनी और लाल चन्दन. इन सभी को एक साथ पानी में भिगोकर  एक रत के लिए रख दें दूसरे दिन सुबह पानी को छानकर  उससे स्नान कर लें. इन वस्तुओं को पानी में डालने के लिए मिट्टी के कलश का प्रयोग किया जा सकता है. मंगल ग्रह के कारन हो रही रोग पीड़ा को शांत  करने के लिए भी यह प्रयोग बहुत उपयोगी है.  जिस  मंगली कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो उसे भी यह प्रयोग करना चाहिए. यह प्रयोग शुक्ल पक्ष में मंगलवार को शुरू करना है. प्रत्येक मंगलवार को यह स्नान करना है.

अतुलनीय धन सम्पदा हेतु श्रीमद्भागवत का विलक्षण अनुष्ठान

Written by sdmadan. Posted in धर्म

धन लाभ के लिए हमें जो उपाय करने चाहिए उनमें से एक अत्यंत प्रभावशाली और त्वरित फल देने वाले उपाय के बारे में श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध के अष्टम अध्याय के आठवें श्लोक में बताया गया है कि महापुराण श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कंध के अष्टम अध्याय के आठवें श्लोक का आठ वर्ष या आठ मास तक सविधि निरंतर पाठ, अनुष्ठान अथवा जप करने से साधक शीघ्र ही दूसरा कुबेर बन जाता है. यह एक अमोघ प्रयोग है जिसका श्रद्धा और विश्वास के साथ नियमित प्रयोग करने या कराने से महालक्ष्मी की परम कृपा प्राप्त होती है. यह अनुष्ठान दृढ संकल्प के साथ शुभ मुहुर्त में आरम्भ करें तो अनुष्ठान की सफलता में संदेह नहीं रहता .

अधिक मास में क्या करें क्या नहीं ?

Written by sdmadan. Posted in धर्म

लगभग पौने तीन वर्ष के अन्तराल से एक एसा महिना आता है जो की महा मास, पुरुषोत्तम मास, मल मास, अधिक मास, मलिम्लुची मास, कुविश्वास मास, इंट्राकैलरी मंथ या लोंद का महीना कहलाता है. सामान्यत एक अधिक मास के बाद दूसरा अधिक मास 32 मास, 16 दिन और 4 घटी के बाद आता है. कार्तिक मास क्षय मास और अधिक मास दोनों हो सकता है. माघ का महीना न तो कभी क्षय मास होता है और न ही कभी अधिक मास होता है. अधिक मास में यह काम नहीं करें ? अधिक मास में देव प्रतिष्ठा, जलाशय- पानी की टंकी का शुभारम्भ कार्य, दान , नए व्रत का आरम्भ, वेदारम्भ, मुंडन कार्य, विवाह. शपथ ग्रहण, गृहारंभ और गृह प्रवेश , नया वहां खरीदने का कार्य नहीं करने चाहिए. यह काम कर सकते हैं ? तीर्थ श्राद्ध, दर्शश्राद्ध, प्रेत श्राद्ध, सपिन्दन, सूर्य और चन्द्र ग्रहण का स्नान, गर्भाधान, अन्नप्राशन, बारहवें महीने का श्राद्ध ये सब काम मल मास में करना चाहिए. इसी प्रकार अधिक मास में नित्य कर्मों का लोप नहीं होता. नैमित्तिक कर्मों में आवश्यकता पड़ने पर महाम्रत्युन्जय जप , शांति कर्म [मूल शांति कर्म आदि ] किये जा सकते हैं. अधिक मास में पूरे मास भर निष्काम भाव से पुराण कथा का श्रवण करें परन्तु सकाम भाव से श्रीमद्भागवत सप्ताह का आयोजन समीचीन नहीं है.अधिक मास में गुड एवं घी से निर्मित ३३ पुए बनाकर सुपात्र ब्राह्मण को देना चाहिए. इन्हें कांसे या सोने के पत्र में रखकर दान करना चाहिए. तथा निम्न मंत्र बोलकर पुए दान करना का मंत्र – विष्णु रुपी सहस्रांशु सर्वपाप प्रणाशनः . अपूनान्न प्रदानेन मम पापं व्यपोहतु . इस प्रकार पुरे अधिक मास भर जो दान करता है उसे विपुल लक्ष्मी तथा सुख वैभव की प्राप्ति होती है.

लक्ष्मी कहाँ रहना पसंद करती है ?

Written by sdmadan. Posted in धर्म

धन मानव जीवन की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. वह भौतिक सुखों का परम साधन है. धार्मिक अनुष्ठानों का मूल माध्यम है. मनप्रतिष्ठा प्राप्ति का महत्वपूर्ण जरिया है. धन के सहारे ही मनुष्य मित्र वर्ग का विस्तार और शत्रु वर्ग का संहार कर सकता है. अतः धन सबके जीवन का सबसे वांछित तत्व है. वह अर्जनीय , संग्रहणीय है.वह प्रेय भी है और श्रेय भी है. वह सबों के लिए अपेक्षित वस्तु है. हम इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते.

अब प्रश्न उठता है कि धन आये तो कहाँ से और कैसे? इस आलेख में हम धन प्राप्ति के इसी प्रश्न पर विचार करेंगे. हम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु इस जगत के पालनकर्ता हैं. महारानी लक्ष्मी उन्ही के अंगों कि सेवा में रहने वाली उनकी प्राणप्रिय धर्मपत्नी हैं. लक्ष्मी जी धन कि अधिष्ठात्री देवी हैं. जिस पर प्रसन्न होती हैं वह क्षण भर में धन्ना सेठ बन कभी खाली होने वाले सोने के खजाने पाता है. उसके दरवाजे पर याचकों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है. राजसी सुख में डूबा हुआ वह संसार में पूज्य बन जाता है. इसके विपरीत महारानी लक्ष्मी जिस पर अप्रसन्न होती हैं वह भूपति होने पर भी संसार में कंगाल बन जाता है. दरदर की ठोकर खाता है और भूखा मर जाता है. वेद , इतिहास, पूरण और आगम ग्रंथों में धनैश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी को प्रसन्न करने की ढेर सारी विधियाँ बतलाई गई हैं. यन्त्र- मंत्रतंत्र , पूजापाठ का सहारा लेने को कहा गया है. लेकिन यह सब करने पर भी कुछ और अनुषांगिक उपाय, पथ्य और परहेज हैं जिनको नहीं जानना और नहीं करने से साधकों को अपने अनुष्ठान में पूरी सिद्धि नहीं मिलती . और वे ज्योतिष तंत्रादी ग्रंथों को, उनके उपदेष्टाओं को और अंततः अपने भाग्य को दोष देते हैं.

अंग्रेजी में एक कवाहट है कि Cleanliness is next godliness अर्थात स्वच्छता इश्वरत्व के सर्वाधिक करीब है. जो व्यक्ति तन से और मन से बाहर और भीतर से पवित्र है समझो उन्होंने इश्वर का सानिध्य प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त कर लिया है. हमारी लक्ष्मी देवी को स्वच्छता अत्यधिक प्रिय है. जो जितना ही स्वच्छ और पवित्र है उसे लक्ष्मी जी की कृपा उतनी ही अधिक मिलती है.

सरस्वतीलक्ष्मी की उपासना करने वालों को चाहिए कि सर्व प्रथम सूर्योदय से पहले जग जाये. यह अति आवश्यक है. देर तक सोने वालों को कभी भी लक्ष्मी उपासना का पूरा लाभ नहीं मिल सकता.

अब उन्हें घरआँगन कि सफाई पर ध्यान देना चाहिए. घर में अगर नौकर चाकर हैं तब उन्हें ताकीद कर दें कि वे भी सूर्य काल से पूर्व उठकर हाथ में झाड़ू पकड़ लें और घर, आँगन, दरवाजा वगैरह को अच्छी तरह बुहार कर साफ़ कर दें. अगर नौकर चाकर नहीं हैं तब घर के मालिक या मालकिन को यह काम स्वयं करना चाहिए. …. 

 

 

 

 

 

जिस बर्तन को चूले पर रख दिया जाता है उसमें  भूल  कर भी भोजन नहीं करें एसा आपने अगर किया तो घर में आई लक्ष्मी चली जाती है. …..
जो व्यक्ति काम और क्रोध के वशीभूत रहते है बड़े बूढ़ों की बातों की खिल्ली उड़ाते है. घर में दूध आदि भोज्य पदार्थों बिना ढंके ही छोड़ देते है लक्ष्मी जी उनके घर में कभी निवास नहीं करती……
[अधिक जानकारी के लिए ग्रह शक्ति का oct.2004 अंक देखें ] 

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