असफलता नाशक गणेश शंख

Written by sdmadan. Posted in उपाय, धर्म, यन्त्र

हमारे धार्मिक संसार में अनेक ऐसी पूजन वस्तुए मिलती हैं जो की अपने आप में अनूठी और विचित्र होती हैं. जिनका उपयोग करके हम अपने जीवन को अधिक अनुकूल और सुखी बना सकते हैं. ऐसी ही एक वस्तु है – गणेश शंख. समुद्र मंथन के समय देव – दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई. जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ. जिनमें सर्वप्रथम पूजित देव गणेश के आकर के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता है. इसे प्रकृति का चमत्कार कहें या गणेश जी की कृपा की इसकी आकृति और शक्ति हू – ब – हू गणेश जी जैसी है. गणेश शंख प्रकृति का मनुष्य के लिए अनूठा उपहार है. निशित रूप से वे व्यक्ति परम सौभाग्यशाली होते हैं जिनके पास या घर में गणेश शंख का पूजन दर्शन होता है. भगवान गणेश सर्वप्रथम पूजित देवता हैं. इनके अनेक स्वरूपों में यथा – विघ्न नाशक गणेश, दरिद्रतानाशक गणेश, कर्ज मुक्तिदाता गणेश, लक्ष्मी विनायक गणेश, बाधा विनाशक गणेश, शत्रुहर्ता गणेश, वास्तु विनायक गणेश, मंगल कार्य गणेश आदि – आदि अनेकों नाम और स्वरुप गणेश जी के जन सामान्य में व्याप्त हैं. गणेश जी की कृपा से सभी प्रकार की विघ्न – बाधा और दरिद्रता दूर होती है. जहाँ दक्षिणावर्ती शंख का उपयोग केवल केवल और केवल लक्ष्मी प्राप्ति के लिए किया जाता है. वहीँ श्री गणेश शंख का पूजन जीवन के सभी क्षेत्रों की उन्नति और विघ्न बाधा की शांति हेतु किया जाता है. गणेश शंख आसानी से नहीं मिलने के कारण दुर्लभ होता है. सौभाग्य उदय होने पर ही इसकी प्राप्ति होती है. इस भौतिक अर्थ प्रधान प्रतिस्पर्धा के युग में बिना अर्थ सब व्यर्थ है. आर्थिक , व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति पाने का श्रेष्ठ उपाय श्री गणेश शंख है. अपमानजनक कर्ज बाधा इसकी स्थापना से दूर हो जाती है. इस शंख की आकृति भगवान गणपति के सामान है. शंख में निहित सूंड का रंग अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य युक्त है. प्रकृति के रहस्य की अनोखी झलक गणेश शंख के दर्शन से मिलती है. विधिवत सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित गणेश शंख की स्थापना चमत्कारिक अनुभूति होती ही है. किसी भी बुधवार को प्रातः स्नान आदि से निवृत्ति होकर विधिवत प्राण प्रतिष्ठित श्री गणेश शंख को अपने घर या व्यापार स्थल के पूजा घर में रख कर धूप – दीप पुष्प से संक्षिप्त पूजन करके रखें. ये अपने आप में चैतन्य शंख है. इसकी स्थापना मात्र से ही गणेश कृपा की अनुभूति होने लगाती है. इसके सम्मुख नित्य धूप – दीप जलना ही पर्याप्त है किसी जटिल विधि – विधान से पूजा करने की जरुरत नहीं है.

सोलह संस्कार

Written by sdmadan. Posted in धर्म, संस्कृति

भारतीय संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है. प्राचीन काल में किसी भी व्यक्ति के प्रत्येक कार्य का शुभारम्भ संस्कार से होता था. वर्तमान में समय और विश्वास की कमी के चलते संस्कारों की संख्या 40 से घटकर 16 रह गई है. सभी पौराणिक धर्मशास्त्रों में संस्कार की आवश्यकता बताई गई है. जैसे खान से सोना निकलने पर सोने में चमक प्रकाश और सौन्दर्य के लिए उसे तपाकर अशुद्धियाँ निकलना जरुरी होता है ठीक उसी तरह मनुष्य की योग्यता और शक्तियों को जाग्रत करने के लिए उसका संस्कारवान होना आवश्यक है.

किसी भी व्यक्ति के व्यक्तितत्व का विकास चरित्र से होता है और चरित्र से ही मनुष्य की विशिष्ठ पहचान बनती है. चरित्र का बल आत्मा का बल है. परिस्थितियों के प्रति मन की प्रतिक्रिया चरित्र का निर्माण करती है. यह प्रतिक्रिया स्वस्थ बनाना ही संस्कार है. चरित्र ही आत्मबल का व्यवहारिक रूप है.

सोलह संस्कारों का विवरण आगे दिया जा रहा है -

1. गर्भाधान संस्कार

2. पुंसवन संस्कार

3. सीमान्तोन्न्यन संस्कार

4. जातकर्म संस्कार

5. नामकरण संस्कार

6. निष्क्रमण संस्कार

7. अन्नप्राशन संस्कार

8. कर्णवेध संस्कार

9. विद्यारम्भ संस्कार

10. चूड़ाकर्म संस्कार

11. यज्ञोपवीत संस्कार

12. वेदारम्भ संस्कार

13. केशांत संस्कार

14. समावर्तन संस्कार

15. विवाह संस्कार

16. अंत्येष्टि संस्कार

व्रत में क्या खाएं क्या नहीं ?

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हमारा देश पर्व त्योहारों का देश है. यहाँ सात वार नौ त्यौहार का चलन है. व्रत में खास बात यह है की विशेष आहार का प्रावधान होता है. व्रत में क्या खाते हैं क्या नहीं ये विचार का विषय है.

व्रत और महाव्रत में सबसे बड़ी चीज है उपवास . स्वास्थ्य के लिए उपवास बहुत उपयोगी है. उपवास के भी कई रूप हैं. एक होता है निर्जल उपवास जो बड़ा कठिन है. इसमें जल की एक बूंद पीना भी मना होता है.

व्रत का एक रूप है – प्रदोष. दिन भर उपवास करके शाम को भोजन करते हैं. कुछ लोग बिना हल्दी का भोजन करते हैं.

एक और प्रथा है – अलोना खाने की अर्थात बिना नमक का भोजन. नवरात्र व्रत करने वाले नौ दिन एकान्न खाने का व्रत लेते हैं. एक फल खाते हैं. केवल दूध ग्रहण करते हैं. नौ दिनों का कठोर व्रत सहन करने बड़ी हिम्मत का कम है.

व्रत में क्या आहार हो इसकी एक लम्बी फेहरिस्त है. इसमें कुछ अन्न हैं, फल हैं, मेवे हैं, mithaeyan हैं. उपन्नों में सबसे महत्वपूर्ण है – कुटू. इसके आते के परांठे बनते हैं. कड़ी और पकोड़े बनते हैं. दूसरा है – saanvan .

इसकी खीर बड़ी अच्छी होती है. साबूदाना की खिचड़ी, मीठी साबूदाना खीर, नमकीन साबूदाना भी अच्छा होता है. साबू दाने के पापड़ तो बड़े ही लोकप्रिय हैं. एक बढ़िया उपन्न है – रामदाना. सबसे सस्ते लड्डू इसी के बनते हैं. व्रत में रामदाना और दूध का संयोग अच्छा बनता है.

एक जलीय फल है – सिंघाड़ा. इसे kachcha खाएं या छोंक के खाएं

singhade को व्रत में खूब खाया जाता hai. सूखे सिंघाड़े के आते से जलेबी, pakaudi , हलवा आदि बनाते hain. उपन्नों में त्रिकुट, तिन्नी आदि की भी खीर , हलवा , जलेबी आदि बनती है. 

एक महत्वपूर्ण निर्णय है की व्रत में समुद्री नमक नहीं खाते. सेंध नमक का ही प्रयोग करते हैं. सलाद में छुहारा, किसमिस, अदरक का मिश्रण , खीरे के लच्छे , फलों का सलाद चलता है. व्रत में मसाले वर्जित हैं. अतः हल्दी और जीरा आदि नहीं लेते हैं.  हरी मिर्च और अदरक को व्रत में खाया जा सकता है. 

व्रत  में सबसे उत्तम आहार आलू को ही माना जाता है.  आलू उबालकर, तलकर और भूनकर खा सकते हैं.  व्रत में आलू के पराठे खाए जा सकते हैं. व्रत में shakaragandi को उबालकर या भूनकर बड़े चाव से खाया जाता है. व्रत में मिथेयाँ भी खूब चलती हैं. लेकिन मिथेयाँ केवल त्रिकूट, सिंघाड़े या खोये की बनी होनी चाहिए. व्रत में पनीर नहीं खाना चाहिए क्योंकि पनीर बनाने के लिए दूध में नमक डालकर उसे फाड़ा जाता है. व्रतों में खाए जाने वाली वस्तुओं में फलों का स्थान सर्वोपरि है. फलों का रजा आम और सदाबहार फल केला व्रत में सबसे ज्यादा खाए जाने वाले फल हैं. प्रसाद के फलों में केला मुख्य होता है. अन्य फल हैं – नाशपाती, संतरा, मौसंबी, अंगूर और अमरुद आदि.

सब्जी में ककड़ी मूली कद्दू आदि खा सकते हैं. प्याज, लहसुन , टमाटर आदि तो वर्जित हैं.

व्रत में सर्वोत्तम है पंचाम्रत  – दूध, घी, शहद, चीनी और दही का मिश्रित पेय. संसार का कोई भी पेय इसकी बराबरी नहीं कर सकता .  व्रत में गाय का dudh पीना भी श्रेष्ठ आहार है.  दही, मट्ठा और छाछ का सेवन भी किया जा सकता है. सफ़ेद चीनी के बदले मिश्री का सेवन करना बेहतर है.

व्रत करना ही है तो निराहार करना चाहिए. इससे तन- मन शुद्ध होता है. पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है. जिन व्यक्तियों का पेट ख़राब रहता हो या स्वास्थ्य ख़राब रहता हो उन्हें कठोर व्रत नहीं करने चाहिए.

श्रीकृष्ण जन्म भूमि

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  1. श्रीकृष्ण जन्म भूमि, मथुरा
  2. बाँके बिहारी मंदिर, वृन्दावन
  3. दानघाटी मंदिर, गोवर्धन
  4. द्वारिकाधीश मंदिर, मथुरा
  5. इस्कोन मंदिर, वृन्दावन
  6. रंगनाथ जी का मंदिर, वृन्दावन
  7. कोकिलावन शनिदेव, कोसी

मंगली दोष

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दांपत्य जीवन में सबसे नकारात्मक प्रभाव डालने  वाले ग्रहों में मंगल प्रमुख है. अमंगल से बचाना है तो मंगली दोष के प्रभाव को शांत करना जरूरी हो जाता है.  जन्म कुंडली में मंगल की स्थिति  लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भावों में होने पर जातक मंगली बन जाता है.

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