वास्तु शास्त्र – प्राकृतिक शक्तियों का संतुलन

Written by sdmadan. Posted in वास्तु

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का आधार प्राकृतिक शक्तियों को अधिकाधिक अनुकूल बनाना है. सुखएश्वर्य से परिपूर्ण जीवन के लिए स्वस्थ शरीर एवं मन का होना आवश्यक है. स्वस्थ मन एवं शरीर होने के लिए आवश्यक है की उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से प्रवाहित होने वाली चुम्बकीय तरंगें मानव जीवन को संचालित करने वाली प्राण शक्ति को प्रवर्धित करे. नियमों की वैज्ञानिकता को इस प्रकार समझा जा सकता हैवास्तु के नियमों में पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है. पूर्व दिशा की और भूखंड, मुख्य द्वार , खिड़कियाँ, रोशनदान होना शुभ मन गया है. ये नियम इसलिए बनाये गए हैं. ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणे अधिकाधिक मिल सकें. वज्ञानिकों के अनुसार सूर्य की जीवनदायिनी किरणों में विटामिन और विटामिन डी एवं विटामिन f मिलाता है. जो की स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है. दोपहर के बाद सूर्य की किरणे इन्फ्रारेड किरणे उत्पन्न करती हैं. जो की स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. यही कारण है की वास्तु शास्त्र में ऊँचे एवं बड़े वृक्षों को भवन के पश्चिम दिशा की और लगाना बताया गया है. ताकि अशुभ प्रभाव करक इन्फ्रारेड किरणों से बचाव हो सके. इस तरह हम समझ सकते हैं की वास्तु शास्त्र के नियम प्राकृतिक ऊर्जा के अनुकूल सामंजस्य के वज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित हैं.

वास्तु में जल की व्यवस्था – शुभ मुहुर्त

Written by sdmadan. Posted in वास्तु

भूमिगत जल की खुदाई कब , कहाँ और किसके हाथों से प्रारंभ कराइ जाये यह एक महत्वपूर्ण कम होता है. वास्तु के आधार पर हमें इसे स्थान का चयन करना चाहिए जिससे की मीठा और पवित्र जल निकले. इसे कई तरीके हैं जिसके आधार पर जल के गुणों का भान किया जा सकता है. कुछ विधियाँ आगे दी जा रही हैंजिस भूमि पर शीशम, सागवान, मीन तथा बेल आदि प्रजाति के वृक्ष सघनता से पाए जाते हैं. वहां पर खुदाई करने से मीठा जल मिलेगा. जहाँ की मिटटी रेतीली , लाल रंग की, कसैली, पिली या भूरे रंग की होगी वहां पर खारे पानी मिलने की संभावना ज्यादा होती है. जिस भूमि का रंग मटमैला या धूसर होता है वहां का जल मीठा होता है. जिस भूमि में रंग नीला,लाल या कला, मुंजकांस से युक्त और बालू युक्त होती है वहां पर निश्चय ही मीठे , स्वादिष्ट और पवित्र जल का निवास होता है. जहाँ भूमि की खुदाई करने पर लहसुनिया , मूंगा, बदल, गुलर के सामान रंग के पत्थर निकलते हैं वहां पर प्रचुर मात्र में जल निकलता है.

शुभ मुहुर्त

भूमिगत जल की प्राप्ति के लिए फाल्गुन , माघ, अगहन, ज्येष्ठ, कार्तिक और वैशाख शुभ महीने होते हैं.

पुष्य , हस्त, शतभिषा, पूर्वाषाढ़ा , उत्तराषाढ़ा, अनुराधा, धनिष्ठा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, रेवती, माघ और मृगशिरा नक्षत्र शुभ होते हैं. इन नक्षत्रों में बोरिंग का कम शुरू करना चाहिए.

तृतीय, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, त्रयोदशी तिथियों में भूमिगत जल की खुदाई का कम शुरू करना शुभ होता है. इन मास, नक्षत्रों और तिथियों में शुरू किया गया काम हमेशा शुभ फलदायक सिद्ध होता है. सोमवार , बुधवार और गुरूवार को जल प्राप्त करने के लिए भूमि की खुदाई शुरू करने का काम शुभ होता है. शुक्रवार और मंगलवार को खुदाई का काम शुरू करने पर उसमें रुकावट आती हैं. वह पूरी नहीं हो पाती है. भूमि से पानी प्राप्त करने के लिए मेष, सिंह और धनु लग्न को छोड़कर बाकि सभी लग्नें शुभ होती हैं. क्योंकि ये सभी लग्नें अग्नि तत्व की स्वामी होती हैं. यदि लग्न में चन्द्रमा बैठा हो तो बहुत शुभ मुहुर्त बन जाता है. इन मुहूर्तों में जल प्राप्ति के लिए भूमि की खुदाई प्रारंभ करने से सरलता से मीठे जल की प्राप्ति होती है.

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वास्तु शास्त्र – प्राकृतिक शक्तियों का संतुलन

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वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों का आधार प्राकृतिक शक्तियों को अधिकाधिक अनुकूल बनाना है. सुखएश्वर्य से परिपूर्ण जीवन के लिए स्वस्थ शरीर एवं मन का होना आवश्यक है. स्वस्थ मन एवं शरीर होने के लिए आवश्यक है की उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव से प्रवाहित होने वाली चुम्बकीय तरंगें मानव जीवन को संचालित करने वाली प्राण शक्ति को प्रवर्धित करे. नियमों की वैज्ञानिकता को इस प्रकार समझा जा सकता हैवास्तु के नियमों में पूर्व दिशा को विशेष महत्व दिया गया है. पूर्व दिशा की और भूखंड, मुख्य द्वार , खिड़कियाँ, रोशनदान होना शुभ मन गया है. ये नियम इसलिए बनाये गए हैं. ताकि सूर्य की जीवनदायिनी किरणे अधिकाधिक मिल सकें. वज्ञानिकों के अनुसार सूर्य की जीवनदायिनी किरणों में विटामिन और विटामिन डी एवं विटामिन f मिलाता है. जो की स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होता है. दोपहर के बाद सूर्य की किरणे इन्फ्रारेड किरणे उत्पन्न करती हैं. जो की स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. यही कारण है की वास्तु शास्त्र में ऊँचे एवं बड़े वृक्षों को भवन के पश्चिम दिशा की और लगाना बताया गया है. ताकि अशुभ प्रभाव करक इन्फ्रारेड किरणों से बचाव हो सके. इस तरह हम समझ सकते हैं की वास्तु शास्त्र के नियम प्राकृतिक ऊर्जा के अनुकूल सामंजस्य के वज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित हैं.

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