अश्वनी नक्षत्र

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अश्वनी नक्षत्र  

इस नक्षत्र की स्थिति राशि चक्र में मेष राशि में शून्य अंश से तेरह अंश बीस कला तक होती है. इस नक्षत्र के स्वामी देव अश्वनी कुमार हैं जो कि देवों के चिकित्सक हैं. इस नक्षत्र की आकृति घोड़े के सिर के समान है. इस नक्षत्र से प्रभावित व्यक्ति घुड़सवार, सैनिक या दैवीय शक्ति संपन्न चिकित्सक (वैद्य) होता है. चिकित्सा का कारक ग्रह अश्वनी नक्षत्र में बैठता है तो वह व्यक्ति सफल चिकित्सक बनता है. इस नक्षत्र का सम्बन्ध ट्रांसपोर्ट (यातायात) या ट्रांसपोर्ट विभाग से होता है. क्योंकि इस नक्षत्र के देव अश्वी जानवरों को सामान लादकर चलते हुए देखे जाते हैं. पुराणों के अनुसार अश्वनी कुमार(जुड़वां भाई) की माता संग और पिता सूर्य हैं. कहा जाता है कि सूर्य के वीर्य के तेज को इनकी माता संग गर्भ में रोक नहीं सकती थी इसलिए उन्होंने सूर्य देव के शुक्र को अपने नथुनों में रख लिया था. इसका कारण अश्वनी नक्षत्र को जुड़वां उत्पत्ति का कारक भी माना जाता है. यदि कुम्भ लग्न हो और मंगल इस नक्षत्र में बैठा हो तो ये जातक के जुड़वां भाई बहिन होने का संकेत देती है. यदि सूर्य ब्रहस्पति या पिता का कारक ग्रह पितृ भाव (9) का स्वामी या पुत्र भाव का स्वामी ग्रह इसी तरह अश्वनी नक्षत्र में बैठा हो तो ऐसे जातक के पिता,चाचा या संतान जुड़वां होती है.

ग्रह दोष निवारण के उपाय

- घर की पूर्व दिशा में लगे हुए किसी भी वट वृक्ष की जड़ को शुभ मुहूर्त में निकालकर पास रखने से राहु ग्रह की पीड़ा शांत होती है.

- यदि राहु ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करना हो तो जल में २ वट पत्र को डालकर उस जल से स्नान करना चाहिए. यह राहु के दुष्प्रभाव को मिटाने का सरल और प्रभावी तरीका है.

- चतुर्दशी के दिन वट वृक्ष की जड़ में दूध चढ़ाने से देव बाधा दूर होती है.

- गिरी के गोले में छेद करके उसमें मेवा और शक्कर भर दें तथा उसे जमीन  में दबा दें. इससे केतु ग्रह का प्रभाव शांत होता है.

- महालक्ष्मी पूजन के समय सीताफल को शामिल करने से दरिद्रता योग का नाश होता है. दीपावली पर इसे पूजन में रखना शुभ होता है.

- चन्द्र ग्रह की पीड़ा शांत करने हेतु चमेली के पुष्प से चन्द्र पूजन करना चाहिए.

- शिवजी को नित्य चमेली का फूल अर्पित करने से भूत बाधा दूर होती है.

- जिस व्यक्ति को नजर लगी हो तो उसके ऊपर लोहे की कील ११ बार उतारकर गूलर वृक्ष के तने में ठोंक दें नजर उतर जाती है. दुकान,व्यापार की नजर उतारने के लिए भी यह प्रयोग किया जा सकता है.

- किसी भी प्रकार के प्रमेह को दूर करने के लिए गूलर की लकड़ी का शहद और गन्ने के रस के साथ हवन करना चाहिए. इससे डायबिटीज़ का शमन होता है.

- मेष राशि के सूर्य के समय एक मसूर तथा दो नीम की पत्तियों को खाने से एक साल तक सर्प भय नहीं रहता.

- अनिंद्रा की स्थिति में मेहँदी के फूल सिरहाने रखने चाहिए. नींद आती है.

- बांस जलाकर तापने से बीमारी होती है.

- बिल्ब, देवदारु और प्रियंगु की जड़ों को एक साथ कूटकर चूर्ण बना लें. इस चूर्ण की धूनी देने से भूत प्रेत भाग जाते हैं.

- बांस को घर में जलाने से अशांति आती है.

- भविष्य पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पलाश का पुष्प शिवजी पर अर्पित करता है उसे भूत बाधा और पितर दोष नहीं सताते हैं.

- बबूल की जड़ में शनिवार को काले तिल चढ़ाने से राहु की पीड़ा शांत होती है. लगातार २१ शनिवार करें.

- व्याधियों के शमन के लिए पलाश के पत्तों की पत्तल में कुछ दिन निरंतर भोजन करना चाहिए.

- अंडी का बीज फैक्ट्री में होने से श्रमिक प्रशासनिक बाधाएँ आती हैं. घर में अंडी का पेड़ अति अशुभ होता है.

- सत्यानाशी की जड़ पास रखने से राहु पीड़ा शांत होती है.

- भरणी नक्षत्र में निकाली गई ग्वारपाठे की जड़ को अपने पास रखने से अस्त्र शस्त्र का भय नहीं रहता.

- हरसिंगार के पुष्प प्रत्येक पूर्णिमा को बाबड़ी में डालने से चन्द्र पीड़ा दूर होती है.

- नवमी तिथि के दिन आंवले के वृक्ष का पूजन करने से सौभाग्य में वृद्वि होती है. वैधव्य का नाश होता है.

- ३ गुलाब, ३ बेला के पुष्प बाबड़ी में डालने से रुका हुआ कार्य बनता है.

चमत्कारिक उपाय

- वाहन को नजर दोष से बचाने के लिए ४ पीले नींबू चारों पहियों से कुचल कर आगे बढे,वाहन दुर्घटना ग्रस्त नहीं होगा.

- अगर आप क्रोधी होते जा रहे हैं तो भोजन के बाद मीठा अवश्य खाएं.

- पीपल वृक्ष को काटने से संतान हानि होती है.

- पीपल वृक्ष पर दिन में देवताओं, रात्रि में असुरों, ब्रह्ममुहूर्त में धर्मराज, संध्याकाल में शनिदेव का वास होता है. इसलिए आधी रात के समय पीपल के नीचे जाने से मना किया जाता है.

- छठ पूजा एकमात्र पर्व है जिसमें सूर्य उदय के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य  दिया जाता है.इस व्रत को करने से सम्पूर्ण सुख मिलते हैं. पति एवं पुत्र दीर्घायु होते हैं.

- षष्टी, प्रतिपदा और अमावस को दातुन नहीं करना चाहिए.

- षष्टी को तेल लगाना निषिद्व है.

- अष्टमी को मांस खाना निषिद्व है.

- चतुर्दशी को बाल कटवाना, दाढ़ी बनवाना निषिद्व है.

- अमावस को कामक्रीड़ा न करें.

- ज्योतिष वारिधि के अनुसार ग्रह की अंगूठी निम्न धातुओं में बनवानी चाहिए.

सूर्य – तांबा, स्वर्ण, प्लेटिनम.

चन्द्र – चाँदी.

मंगल – रक्तवर्ण तांबा.

बुध – पीतल.

गुरु – स्वर्ण.

शुक्र – कांसा.

शनि – लोहा.

राहु – टिन.

केतु – सीसा.

ग्रहों की दक्षिणा

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ग्रहों की दक्षिणा

सूर्य की प्रसन्नता के लिए धेनु, चंद्रमा की प्रसन्नता के लिए शंख, मंगल की प्रसन्नता के लिए लाल बैल, बुध की प्रसन्नता के लिए सोना, गुरु की प्रसन्नता के लिए पीताम्बर, शुक्र की प्रसन्नता के लिए सफ़ेद घोड़ा, शनि की प्रसन्नता के लिए काली गौ, राहु की प्रसन्नता के लिए बकरा ब्रह्मण को दान में देना चाहिए.

हमारे पाप और हमारी पीडाएं

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हमारे पाप और हमारी पीडाएं

हम अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनते हैं कि मैंने कभी कोई बुरा काम नहीं किया फिर भी मैं बीमारियों से परेशान हूँ. ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा हैं. क्या भगवान बहुत कठोर और निर्दयी हैं ?

पहली बात तो हमें ये समझ लेनी चाहिए कि हमारे कार्यों और भगवान का कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिए हमें अपनी परेशानियों और पीडाओं के लिए ईश्वर को दोषी नहीं मानना चाहिए. यदि आप सह्गुनी हैं तो आप जीवन में संपन्न और सुखी रहते हैं. यदि आप लोगों को सताते हैं या पाप कर्म करते हैं तो आप पीड़ित होते हैं और तरह तरह की बीमारियाँ कष्ट देती हैं. हमारे कार्यों का हम पर निश्चित रूप से असर होता है. कभी हमारे कर्मों का प्रभाव इसी जन्म में तो कभी अगले जन्म में मिलता हैं लेकिन मिलता जरुर है. आशय है कि हम अपने कर्मों के प्रभाव से कभी मुक्त नहीं होते यह बात अलग है कि इसका प्रभाव तुरंत दिखाई न दे .

इस लेख में इस बात का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है कि हमारे पाप हमें किस रूप में लौटकर मिलते हैं और पीड़ित करते हैं. यदि आप किसी रोग से पीड़ित है तो ये समझें कि आपने अवश्य ही कोई पाप पूर्व जन्म में किया है. आपके पाप कर्म द्वारा होने वाली कुछ बीमारियों को साकेंतिक रूप में नीचे दिया जा रहा है.

- लोगों का धन लूटने वाले गले की बीमारी से पीड़ित होते हैं.

- पढ़े लिखे ज्ञानी जन के प्रति दुर्भावना से काम करने वाले व्यक्ति को सिरदर्द की शिकायत रहती है.

- हरे पेड़ काटने वाले और सब्जियों की चोरी करने में लगे व्यक्ति अगले जन्म में शरीर के अन्दर अल्सर (घाव)से पीड़ित होते हैं.

- झूठे और धोखाधड़ी करने वाले लोगों को उल्टी की बीमारी होती है.

- गरीब लोगों का धन चुराने वाले लोगों को कफ और खांसी से कष्ट होता है.

- यदि कोई समाज के श्रेष्ठ पुरुष (विद्वान) की हत्या कर देता है तो उसे तपेदिक रोग होता है.

- गाय का वध करने वाले कुबड़े बनते हैं.

- निर्दोष व्यक्ति का वध करने वाले को कोढ़ होता है.

- जो अपने गुरु का अपमान करता है उसे मिर्गी का रोग होता है.

- वेद और पुराणों का अपमान और निरादर करने वाले व्यक्ति को बार बार पीलिया होता है.

- झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति गूंगे हो जाते हैं.

- पुस्तकों और ग्रंथो की चोरी करने वाले व्यक्ति अंधे हो जाते हैं.

- गाय और विद्वानों को लात मरने वाले व्यक्ति अगले जन्म में लगड़े बनते हैं.

- वेदों और उसके अनुयायियों का निरादर करने वाले व्यक्ति को किडनी रोग होता है.

- दूसरों को कटु वचन बोलने वाले अगले जन्म में हृदय रोग से कष्ट पाते हैं.

- जो सांप, घोड़े और गायों का वध करता है वह संतानहीन होता है.

- कपड़े चुराने वालों को चर्म रोग होते हैं.

- परस्त्रीगमन करने वाला अगले जन्म में कुत्ता बनता है.

- जो दान नहीं करता है वह गरीबी में जन्म लेता है.

- आयु में बड़ी स्त्री से सहवास करने से डायबिटीज़ रोग होता है.

- जो अन्य महिलाओं को कामुक नजर से देखता है उसकी आंखें कमजोर होती हैं.

- नमक चुराने वाला व्यक्ति चींटी बनता है.

- जानवरों का शिकार करने वाले बकरे बनते हैं.

- जो ब्राह्मन होकर भी गायत्री मंत्र नहीं पढ़ता वो अगले जन्म में बगुला बनता है.

- जो ज्ञानी और सदाचारी पुरुषों को दिए गए अपने वचन से मुकर जाता है वह अगले जन्म में गीदड़ बनता है.

- जो दुकानदार नकली माल बेचते हैं वे अगले जन्म में उल्लू बनते हैं.

- जो अपनी पत्नी को पसंद नहीं करते वो खच्चर बनते है.

- जो व्यक्ति अपने माता पिता और गुरुजनों का निरादर करता है उसकी गर्भ में ही हत्या हो जाती है.

- मित्र की पत्नी से सम्बन्ध बनाने की इच्छा रखने वाला अगले जन्म में गधा बनता है.

- मदिरा का सेवन करने वाला व्यक्ति भेड़ियाँ बनता है.

- जो स्त्री अपने पति को छोड़कर दूसरे पुरुष के साथ भाग जाती है वह घोड़ी बन जाती है.

पूर्व जन्म में किये गए पापों से उत्त्पन्न रोग कैसे दूर हों ?

पूर्व जन्मार्जितं पापं व्याधि रूपेण व्याधिते,

तछंती: औषधनैधान्ने: जपाहोमा क्रियादिभी:

पूर्व जन्म के जो पाप हमें रोग के रूप में आकर पीड़ित करते हैं उनका निराकरण करने के लिए दवाइयां, दान, मंत्र जप, पूजा, अनुष्ठान करने चाहिए. केवल यह ही नहीं हमें गलत काम करने से भी बचना चाहिए. तभी हम पूर्वजन्म कृत पापों के दुष्प्रभाव से मुक्त हो सकेगें.

जिस प्रकार रोग का निवारण करने से पहले रोग की ठीक ठीक पहचान करना बहुत जरुरी है. रोग की पहचान के बाद ही उसका इलाज किया जाता है उसी प्रकार कुंडली में ग्रह दोषों के आधार पर पूर्व जन्म में किये गए पाप कर्मों को जानकर उनका समाधान कराया जाये तो निश्चय ही रोग पीड़ा से शीघ्रता से मुक्ति होती है. पाठकों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि जब मैंने जन्म कुंडली में पूर्व जन्मकृत पापों को जानकर उनका प्राश्यिचत करा दिया तो अनेक ऐसे रोगियों को तत्काल स्वास्थ्य में सुधार आना शुरू हो गया जो लगातार इलाज चलने के बाद भी निरंतर रोगी बने हुए थे. ऐसे व्यक्ति जो बहुत अच्छे चिकित्सक के इलाज के बाद भी रोगी बने हुए हैं वे मुझसे संपर्क करके रोग मुक्त होने के लिए मार्गदर्शन ले सकते हैं. -संपादक

अश्वनी नक्षत्र

इस नक्षत्र की स्थिति राशि चक्र में मेष राशि में शून्य अंश से तेरह अंश बीस कला तक होती है. इस नक्षत्र के स्वामी देव अश्वनी कुमार हैं जो कि देवों के चिकित्सक हैं. इस नक्षत्र की आकृति घोड़े के सिर के समान है. इस नक्षत्र से प्रभावित व्यक्ति घुड़सवार, सैनिक या दैवीय शक्ति संपन्न चिकित्सक (वैद्य) होता है. चिकित्सा का कारक ग्रह अश्वनी नक्षत्र में बैठता है तो वह व्यक्ति सफल चिकित्सक बनता है. इस नक्षत्र का सम्बन्ध ट्रांसपोर्ट (यातायात) या ट्रांसपोर्ट विभाग से होता है. क्योंकि इस नक्षत्र के देव अश्वी जानवरों को सामान लादकर चलते हुए देखे जाते हैं. पुराणों के अनुसार अश्वनी कुमार(जुड़वां भाई) की माता संग और पिता सूर्य हैं. कहा जाता है कि सूर्य के वीर्य के तेज को इनकी माता संग गर्भ में रोक नहीं सकती थी इसलिए उन्होंने सूर्य देव के शुक्र को अपने नथुनों में रख लिया था. इसका कारण अश्वनी नक्षत्र को जुड़वां उत्पत्ति का कारक भी माना जाता है. यदि कुम्भ लग्न हो और मंगल इस नक्षत्र में बैठा हो तो ये जातक के जुड़वां भाई बहिन होने का संकेत देती है. यदि सूर्य ब्रहस्पति या पिता का कारक ग्रह पितृ भाव (9) का स्वामी या पुत्र भाव का स्वामी ग्रह इसी तरह अश्वनी नक्षत्र में बैठा हो तो ऐसे जातक के पिता,चाचा या संतान जुड़वां होती है.

ग्रह दोष निवारण के उपाय

- घर की पूर्व दिशा में लगे हुए किसी भी वट वृक्ष की जड़ को शुभ मुहूर्त में निकालकर पास रखने से राहु ग्रह की पीड़ा शांत होती है.

- यदि राहु ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करना हो तो जल में २ वट पत्र को डालकर उस जल से स्नान करना चाहिए. यह राहु के दुष्प्रभाव को मिटाने का सरल और प्रभावी तरीका है.

- चतुर्दशी के दिन वट वृक्ष की जड़ में दूध चढ़ाने से देव बाधा दूर होती है.

- गिरी के गोले में छेद करके उसमें मेवा और शक्कर भर दें तथा उसे जमीन  में दबा दें. इससे केतु ग्रह का प्रभाव शांत होता है.

- महालक्ष्मी पूजन के समय सीताफल को शामिल करने से दरिद्रता योग का नाश होता है. दीपावली पर इसे पूजन में रखना शुभ होता है.

- चन्द्र ग्रह की पीड़ा शांत करने हेतु चमेली के पुष्प से चन्द्र पूजन करना चाहिए.

- शिवजी को नित्य चमेली का फूल अर्पित करने से भूत बाधा दूर होती है.

- जिस व्यक्ति को नजर लगी हो तो उसके ऊपर लोहे की कील ११ बार उतारकर गूलर वृक्ष के तने में ठोंक दें नजर उतर जाती है. दुकान,व्यापार की नजर उतारने के लिए भी यह प्रयोग किया जा सकता है.

- किसी भी प्रकार के प्रमेह को दूर करने के लिए गूलर की लकड़ी का शहद और गन्ने के रस के साथ हवन करना चाहिए. इससे डायबिटीज़ का शमन होता है.

- मेष राशि के सूर्य के समय एक मसूर तथा दो नीम की पत्तियों को खाने से एक साल तक सर्प भय नहीं रहता.

- अनिंद्रा की स्थिति में मेहँदी के फूल सिरहाने रखने चाहिए. नींद आती है.

- बांस जलाकर तापने से बीमारी होती है.

- बिल्ब, देवदारु और प्रियंगु की जड़ों को एक साथ कूटकर चूर्ण बना लें. इस चूर्ण की धूनी देने से भूत प्रेत भाग जाते हैं.

- बांस को घर में जलाने से अशांति आती है.

- भविष्य पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पलाश का पुष्प शिवजी पर अर्पित करता है उसे भूत बाधा और पितर दोष नहीं सताते हैं.

- बबूल की जड़ में शनिवार को काले तिल चढ़ाने से राहु की पीड़ा शांत होती है. लगातार २१ शनिवार करें.

- व्याधियों के शमन के लिए पलाश के पत्तों की पत्तल में कुछ दिन निरंतर भोजन करना चाहिए.

- अंडी का बीज फैक्ट्री में होने से श्रमिक प्रशासनिक बाधाएँ आती हैं. घर में अंडी का पेड़ अति अशुभ होता है.

- सत्यानाशी की जड़ पास रखने से राहु पीड़ा शांत होती है.

- भरणी नक्षत्र में निकाली गई ग्वारपाठे की जड़ को अपने पास रखने से अस्त्र शस्त्र का भय नहीं रहता.

- हरसिंगार के पुष्प प्रत्येक पूर्णिमा को बाबड़ी में डालने से चन्द्र पीड़ा दूर होती है.

- नवमी तिथि के दिन आंवले के वृक्ष का पूजन करने से सौभाग्य में वृद्वि होती है. वैधव्य का नाश होता है.

- ३ गुलाब, ३ बेला के पुष्प बाबड़ी में डालने से रुका हुआ कार्य बनता है.

चमत्कारिक उपाय

- वाहन को नजर दोष से बचाने के लिए ४ पीले नींबू चारों पहियों से कुचल कर आगे बढे,वाहन दुर्घटना ग्रस्त नहीं होगा.

- अगर आप क्रोधी होते जा रहे हैं तो भोजन के बाद मीठा अवश्य खाएं.

- पीपल वृक्ष को काटने से संतान हानि होती है.

- पीपल वृक्ष पर दिन में देवताओं, रात्रि में असुरों, ब्रह्ममुहूर्त में धर्मराज, संध्याकाल में शनिदेव का वास होता है. इसलिए आधी रात के समय पीपल के नीचे जाने से मना किया जाता है.

- छठ पूजा एकमात्र पर्व है जिसमें सूर्य उदय के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य  दिया जाता है.इस व्रत को करने से सम्पूर्ण सुख मिलते हैं. पति एवं पुत्र दीर्घायु होते हैं.

- षष्टी, प्रतिपदा और अमावस को दातुन नहीं करना चाहिए.

- षष्टी को तेल लगाना निषिद्व है.

- अष्टमी को मांस खाना निषिद्व है.

- चतुर्दशी को बाल कटवाना, दाढ़ी बनवाना निषिद्व है.

- अमावस को कामक्रीड़ा न करें.

- ज्योतिष वारिधि के अनुसार ग्रह की अंगूठी निम्न धातुओं में बनवानी चाहिए.

सूर्य – तांबा, स्वर्ण, प्लेटिनम.

चन्द्र – चाँदी.

मंगल – रक्तवर्ण तांबा.

बुध – पीतल.

गुरु – स्वर्ण.

शुक्र – कांसा.

शनि – लोहा.

राहु – टिन.

केतु – सीसा.

ग्रहों की दक्षिणा

सूर्य की प्रसन्नता के लिए धेनु, चंद्रमा की प्रसन्नता के लिए शंख, मंगल की प्रसन्नता के लिए लाल बैल, बुध की प्रसन्नता के लिए सोना, गुरु की प्रसन्नता के लिए पीताम्बर, शुक्र की प्रसन्नता के लिए सफ़ेद घोड़ा, शनि की प्रसन्नता के लिए काली गौ, राहु की प्रसन्नता के लिए बकरा ब्रह्मण को दान में देना चाहिए.

पापों का प्रायश्चित

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पापों का प्रायश्चित

हम मनुष्य कर्मों से बंधे हुए हैं. अपने कर्मों के अनुसार हमें उसका फल भी भोगना होता है. अच्छे कर्म का अच्छा फल मिलता है और अपराध के लिए दंड भी मिलता है. हमसे जाने अनजाने अपराध भी हो जाता है. ईश्वर अपनी संतान का अपराध क्षमा करने देता है जब उसकी संतान अपराध मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है एवं अपराध शमन के लिए व्रत करता है.

अपराध शमन व्रत महात्मय

शत अपराध शमन व्रत मार्गशीर्ष मास में द्वाद्वर्शी के दिन शुरू होता है. इस तिथि से प्रत्येक द्वादशी के दिन इस व्रत को करने का विधान है. इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति जाने अनजाने शत अपराध करता है उस अपराध का शमन होता है और व्यक्ति अपराध मुक्त होकर मृत्यु के पश्चात् ईश्वर के समक्ष पहुँचता है जिससे सुख और उत्तम गति को प्राप्त होता है. ब्रह्मा जी ने इस व्रत के महत्वा के विषय में कहा है की यह व्रत अनंत व इच्छित फल देने वाला है. यह व्रत करने वाला स्वस्थ एवं विद्वान होता है और वह धर्म, अर्थ, कम और मोक्ष का भागी होता है.

अपराध मुक्ति व्रत कथा

एक समय की बात है रजा इक्षवाकू ने परम श्रद्रेय महर्षि वशिष्ठ जी से प्रश्न किया हे गुरुदेव हम लाख चाहने के बावजूद जाने अनजाने अपने जीवन में शताधिक पापकर्म तो अपने सम्पूर्ण जीवन में कर ही लेते है. इन अपराधो के कारण मृत्यु के बाद हमें और हमारी पीढ़ियों के लिए दुख का कारण होता है. हे प्रभु कोई ऐसा व्रत बताइए जिसको करने से सभी पाप मिट जाये व हमें महाफल की प्राप्ति हो. राजा की बातों को सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा हे राजन एक ऐसा व्रत है जिसको विधि पूर्वक करने से समस्त पापो का नाश होता है. महर्षि ने राजा को शत अपराध बताते हुए कहा की हे राजन शास्त्रों में जो शत अपराध बताये गए हैं उनके अनुसार चरों आश्रमों में अनाशक्ति, नास्तिकता, हवन कर्म का परित्याग, अशौच, निर्दयता, लोभी, ब्रह्मचर्य का पालन न डरना, व्रत का पालन न करना, दान पुण्य न करना, गलत कार्य करना, हिंसा, चोरी, झूठ, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, घमंड, प्रमाद, किसी को दुःख पहुचने वाली बात कहना, वेदों की निंदा करना, नास्तिकता को बढ़ावा देना, माता को परेशान करना, पुत्र एवं अपने आश्रितों के प्रति कर्तव्य का पालन न करना, अपूज्य की पूजा करना, जप में अविश्वास पंचयज्ञ का पालन न करना, संध्या पूजन न करना, पर्व आदि में स्त्री के साथ सम्भोग करना, परायी स्त्री के प्रति आसक्त होना, वेश्यागमन करना, माता पिता की सेवा न करना, पुराणों को न मानना, मसहरी भोज्यों का सेवन करना, अकारण किसी से लड़ना, बिना विचारे काम करना, एक से अधिक पत्नियाँ होना, मन पर काबू न कर पाना, शास्त्र का पालन न करना, धन हड़प लेना, गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान को न मानना, पत्नी, पुत्र या पुत्री को बेचना, जल को दूषित करना, वृक्ष काटना, भीख मांगना, विद्या बेचना, बुरी सांगत, गो हत्या, स्त्री हत्या, मित्र हत्या, कर्म न करना, विधि का पालन न करना, दूसरे से अन्न मांग कर गुजर करना, संस्कारहीन होना, सोना चोरी करना, ब्राह्मन की हत्या या अपमान करना, गुरु पत्नी से संसर्ग करना, पापियों से सम्बन्ध रखना, मजबूर व कमजोरो की मदद न करना, ये सभी महा अपराध की श्रेणी में आते हैं. महर्षि वशिष्ठ ने कहा इन अपराधो से मुक्ति के लिए भगवन सत्य देव की पूजा करनी चाहिए. भगवान विष्णु अपनी प्रिय लक्ष्मी के साथ सत्यरूप व्रज पर बैठीं हैं. इनके पूर्व में वामदेव, दक्षिण में नृसिंह, पच्छिम में कपिल, उदर में वराह एवं उरु स्थान में अच्युत भगवान स्थित हैं जो अपने भक्तो का सदैव कल्याण करते हैं. शंख, चक्र, गदा व पद्म से युक्ता भगवान विष्णु जिनकी जाया, विजय, जयंती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वन्जुली, त्रिस्पर्शा , एवं ववधर्ना आठ शक्तियां हैं, जिनके अग्र भाग से गंगा प्रकट हुई है. भक्तवत्सल भगवान सत्यदेव की पूजा मार्गशीर्ष से शुरू करनी चाहिए और प्रत्येक पक्ष की द्वादशी के दिन विधि पूर्वक पूजा करके व्रत करना चाहिए.

अपराध शमन व्रत विधान

दोनों पक्ष की द्वादशी तिथि को नित्यकर्म के बाद भगवान सत्यदेव की पूजा एवं व्रत का संकल्प करना चाहिए. संकल्प के बाद भगवान सत्यदेव और देवी लक्ष्मी की स्वर्ण प्रतिमा ढूध से भरे कलश पर स्थापित करके सबसे पहले इनकी अष्ठ शक्तियों की पूजा करनी चाहिए. इसके बाद लक्ष्मी सहित भगवान सत्यदेव की षोडशोपचार सहित पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा सहित विदा करना चाहिए. वर्ष पर्यंत दोनों पक्षों में इस व्रत का पालन करने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए. उद्यापन के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा एवं स्वर्ण प्रतिमा सहित विदा देना चाहिए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. इस प्रकार इस व्रत को विधिपूर्वक संपन्न करने से मनुष्य समस्त प्रकार के पापों से छुटकारा पा लेता है.

जप का आधार है माला

सभी धर्मों की तरह हिन्दू धर्म में भी जप के लिए माला का प्रयोग किया जाता है. प्रत्येक जप में संख्या का बहुत महत्व है. निश्चित संख्या में जप करने के लिए माला का प्रयोग सदा से ही होता आया है. माला फेरने से मनुष्य की एकाग्रता में भी वृद्वि होती है. प्रत्येक मंत्र के लिए जप संख्या निश्चित होती है. उस निश्चित संख्या का १० प्रतिशत हवन, हवन का १० प्रतिशत तर्पण, तर्पण का १० प्रतिशत मार्जन व मार्जन की १० प्रतिशत संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है. इस प्रकार इन सभी संख्यायों का निर्धारण बिना माला के संभव नहीं है. वास्तविकता में जप का आधार माला ही है.

एक माला में १०८ मनके व एक सुमेरु होता है. वैसे ५४, २७ आदि मनको की माला से भी जप किया जा सकता है. दो मनको के मध्य डोरी में गांठ होना आवश्यक है, सामान्यत: ढाई गांठ की माला अच्छी मानी जाती है. डोरी में मनके पिरोते समय प्रभु का स्मरण करना चाहिए. सफ़ेद धागे से निर्मित माला शांति, सिद्वि व अन्य शुभ कार्यों के लिए प्रयोग की जाती है. लाल डोरी से वशीकरण व काले धागे से निर्मित माला का प्रयोग मारन कर्म के लिए किया जाता है. माला पिरोते समय मुख और पुछ का विशेष ध्यान रखना चाहिए. मनके के मोटे सिरे को मुख तथा पतले किनारे को पुछ कहते है. माला पिरोते समय मनको के मुख से मुख तथा पुछ से पुछ मिलकर पिरोने चाहिए. माला में खंडित मनको का प्रयोग कतई नहीं करना चाहिए. जिस माला को धारण करते हैं उस पर जप नहीं करते लेकिन उसी किस्म की दूसरी माला का प्रयोग किया जा सकता है. जप करते समय माला किसी वस्त्र से ढकी होनी चाहिए अन्यथा जप का फल चोरी हो जाता है. जप के बाद जप स्थान की मिट्टी मस्तक पर लगा लेनी चाहिए अन्यथा जप का फल इन्द्र ले जाते है. प्रात: कल के जप के समय माला नाभि के पास होनी चाहिए, दोपहर में हृदय के पास और शाम को मस्तक के सामने. जप में माला को तर्जनी अंगुली से स्पर्श नहीं करना चाहिए. वस्त्र के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बहार निकल कर जप करना चाहिए. प्रात: कल के जप के समय माला नाभि के पास होनी चाहिए, दोपहर में हृदय के पास और शाम को मस्तक के सामने. जप में माला को तर्जनी अंगुली से स्पर्श नहीं करना चाहिए. वस्त्र के बड़े छेद से हाथ अन्दर डाल कर छोटे छेद से तर्जनी को बहार निकल कर जप करना चाहिए. अभिचार कर्म में तर्जनी का प्रयोग किया जाता है. जप में माला का स्पर्श नाख़ून से नहीं होना चाहिए. सुमेरु के बाद वाले दाने से जप प्रारम्भ करना चाहिए. माला को माध्यम ऊँगली के पोर पर रख कर दानों को अंगूठे की सहायता से अपनी ओर गिराएँ. सुमेरु को नहीं लाघना चाहिए. यदि एक माला से अधिक जप करना हो तो सुमेरु तक पहुँच कर अंतिम दाने को पकड़कर माला पलटी कर के माला की उलटी दिशा में लेकिन पहले की तरह ही जप करना चाहिए. रुद्राक्ष की माला भगवान शंकर को प्रिय है और इसे सभी देवी देवताओं की पूजा आराधना प्रयोग किया जा सकता है. रुद्राक्ष पर जप करने से अनंत गुना फल मिलता है. इसे धारण करना भी स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है.

सर्वप्रथम जप से पूर्व निम्नलिखित मंत्र से माला की वंदना करनी चाहिए-

ॐ मां मेल महामाये सर्वशक्तिस्वरुपिनी,

चतुवृग न्यस्तस्तास्मान्मे सिद्विदा भव,

ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं ग्रहमी दक्षिण करे,

जपकाले च सिद्ध्य्था प्रसिद मम सिद्वये

हाथी दांत की माला गणेशजी की साधना के लिए श्रेष्ठ मानी गई है. लाल चन्दन की माला गणेश जी व देवी साधना के लिए उत्तम है. मुंगे की माला से लक्ष्मी जी की आराधना होती है. पुष्टि कर्म के लिए भी मुंगे की माला श्रेष्ठ होती है. तुलसी की माला से वैष्णव मत की साधना होती है (विष्णु, राम व क्रषण). मोती की माला वशीकरण के लिए श्रेष्ठ मानी गयी है. पुत्र जीवा की माला का प्रयोग संतान प्राप्ति के लिए करते हैं. हल्दी की माला का प्रयोग बगलामुखी की साधना होती है. कुश मूल की माला का प्रयोग पाप नाश व दोष मुक्ति के लिए होता है. कमल गट्टे की माला का प्रयोग अभिचार कर्म के लिए होता है. चाँदी की माला राजसिक प्रयोजन तथा आपदा से मुक्ति में विशेष प्रभावकारी होती है. स्फटिक की माला शांति कर्म और ज्ञान प्राप्ति माँ सरस्वती व भैरवी की आराधना के लिए श्रेष्ठ होती है.

शनि की साढ़ेसाती के अशुभ फलों के उपाय

1 . राजा दशरथ रचित शनि स्त्रोत के सवा लाख जप करे.

2. घर में पारद और स्फटिक शिवलिंग(अन्य नहीं) एक चौकी पर स्थापित कर विधानपूर्वक पूजा अर्चना कर रुद्राक्ष की माला से महामृत्युन्जय मंत्र का जप करना चाहिए.

3. सुन्दरकाण्ड का पाठ एवं हनुमान उपासना संकटमोचन का पाठ करे.

4. हनुमान चालीसा, शनि चालीसा और शनेश्चर देव के मंत्रो का पाठ करे. ॐ शं शनिश्चराय नम:

5. घर के मुख्य द्वार पर काले घोड़े की नाल शनिवार के दिन लगावें.

6. शनिवार को सायंकाल पीपल के पेड़ के नीचे मीठे तेल का दीपक जलाएं.

7. काले तिल, काली गाय, कम्बल, ऊनी वस्त्र, चमड़े के जुटे, तिल का तेल, उरद, लोहा, भैंस, कस्तूरी, स्वर्ण, तांबा आदि का दान करे.

8. शनि विग्रह के दर्शन करे मुख के दर्शन करने से बचे.

9. घोड़े की नाल अथवा नाव की कील का छल्ला बनवाकर मध्यमा अंगुली में धारण करे.

10. शनि जयंती पर शनि मंदिर जाकर शनिदेव का अभिषेक कर दर्शन करे.

11. शनिदेव के मंदिर जाकर उन्हें काले वस्त्रों से सुसज्जित कराकर काले गुलाब जामुन का प्रसाद चढ़ाएं.

12. कडवे तेल में परछाई देखकर उसे अपने ऊपर सात बार उसारकर दान करें.

13. श्रावण मास के शुक्ल पक्ष से शनि व्रत आरम्भ करें, ३३ व्रत करने चाहिए उसके बाद उद्यापन करके दान करें.

14. शनि के तांत्रिक मंत्र का २३००० जप करे फिर २७ दिन तक शनि स्त्रोत के चार पाठ रोज करें.

15. अपने घर के मंदिर में एक डिबिया में सवा तिन रत्ती का नीलम सोमवार को रख दें और हाथ में १२ रुपये लेकर प्रार्थना करें शनिदेव ये आपके नाम के हैं फिर शनिवार को इन रुपयों में से १० रूपये के सतनाज खरीद कर शेष २ रुपये सहित झाड़ियों या चीटीं के बिल पर बिखेर दें और शनिदेव से कष्ट मुक्ति की प्रार्थना करें.

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